अब पसंदीदा गाड़ी खरीदना होगा और मुश्किल! हॉर्मुज संकट की तपिश से स्टील से टायर तक सब महंगा


ईरान-इज़राइल-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब सीधे भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर पर दिखने लगा है. कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, शिपिंग कॉस्ट में बढ़ोतरी और सप्लाई चेन पर दबाव ने कंपनियों की लागत बढ़ा दी है. युद्ध का सबसे पहला और सबसे बड़ा असर गाड़ी बनाने वाले कच्चे माल पर पड़ा है. स्टील, एल्युमीनियम, रबर, प्लास्टिक, पेंट और केमिकल गाड़ी के हर हिस्से की कीमत बढ़ रही है.

दुनिया का तेल बेंचमार्क बेरंट क्रूड 110 से 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है. पेट्रोकेमिकल से बनने वाले पेंट और केमिकल की कीमत तो सबसे पहले और सबसे तेज़ बढ़ती है, क्योंकि ये सीधे क्रूड से जुड़े हैं. इसको ऐसे समझे कि अब गाड़ी का हर हिस्सा महंगा बन रहा है और यह महंगाई कंपनियों तक पहुंच रही है.

कंपनियों पर दबाव की कीमत बढ़ाएं या मार्जिन घटाएं?

ब्रोकरेज फर्म Elara Securities ने रिपोर्ट में बताया है कि भारतीय ऑटो सेक्टर दो तरफ से दबाव में है. एक तरफ मिडिल ईस्ट में एक्सपोर्ट बंद होने का सीधा नुकसान है और दूसरी तरफ महंगे कच्चे माल बढ़े हुए माल-भाड़ा दरें और टूटी हुई सप्लाई चेन का दबाव. असर उन कंपनियों पर भी पड़ रहा है, जिनका मिडिल ईस्ट से सीधा कारोबार कम है. 

  • टाटा मोटर्स ने 1 अप्रैल 2026 से पेट्रोल-डीज़ल-CNG वाहनों के दाम औसतन 0.5% बढ़ाए हैं और कमर्शियल व्हीकल्स पर 1.5% तक की बढ़ोतरी की है.
  • जेएसडब्लू एमजी मोटर पूरी रेंज पर 2% दाम बढ़ाए हैं.
  • बीएमडब्लू और Mercedes-Benz ने भी 2% की बढ़ोतरी की है.
  • किआ इंडिया ने भी लागत बढ़ने का संकेत दिया है.

Maruti Suzuki और Mahindra & Mahindra फिलहाल कीमत नहीं बढ़ा रहे, लेकिन दोनों कंपनियों ने साफ कह दिया है अगर हालात लंबे चले तो दाम बढ़ाना मजबूरी बन जाएगा.

फ्यूल महंगा तो EV की डिमांड तेज़

युद्ध के चलते पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों को लेकर जो डर और अनिश्चितता बनी है उसने बाज़ार में एक नया ट्रेंड शुरू कर दिया है. लोग EV को सेफ ऑप्शन मानकर खरीद रहे हैं, क्योंकि EV running cost कम है फ्यूल प्राइज का जोखिम नहीं है और सरकार की सपोर्ट भी है. फरवरी 2026 में देशभर में EV की बिक्री 25% से ज़्यादा बढ़ी. Mahindra की EV बिक्री तो करीब दोगुनी हो गई.

ओवरऑल EV retail sales 44% बढ़ीं यह भारत का अब तक का सबसे ऊँचा monthly EV retail record था. इस पूरे बदलाव का सबसे ज़्यादा फायदा Tata Motors और Mahindra को मिल रहा है.

शिपिंग और सप्लाई चेन है छुपा हुआ बड़ा खतरा!

होरमुज़ जलडमरूमध्य की करीब-करीब बंदी के बाद दुनिया की सबसे बड़ी शिपिंग कंपनियों ने वो रास्ता छोड़ दिया है. इससे भाड़ा बढ़ा है डिलीवरी में देरी आई है और पार्ट्स का इमोर्ट महंगा हो गया है.

Elara Securities के मुताबिक ज़्यादातर भारतीय ऑटो कंपनियों के लिए freight cost कुल revenue का 1% से 3% होता है. यह आंकड़ा छोटा लगता है, लेकिन ऑटो जैसे सेक्टर में जहां मार्जिन्स पहले से बहुत पतले होते हैं, वहां यह सीधे मुनाफे पर चोट करता है. इसका असर सिर्फ बड़ी गाड़ी कंपनियों पर नहीं बल्कि पूरे ऑटो कंपोनेन्ट सेक्टर पर पड़ रहा है.

टायर और केमिकल सेक्टर पर सबसे ज़्यादा मार

टायर कंपनियों में auto ancillary सेक्टर में सबसे ज़्यादा दबाव में है. रबर और क्रूड से जुड़ा कच्चा माल तेज़ी से महंगा हो रहा है लेकिन टायर कंपनियां फोरन अपनी कीमतें नहीं बढ़ा सकतीं, क्योंकि उनके बड़े ग्राहक खुद ओईएम कंपनियां हैं. 

नतीजा यह है कि margin की सबसे ज़्यादा squeeze यहीं हो रही है. मार्च 2026 में natural gas की कमी की खबरें आते ही Nifty Auto 2.6% गिर गया. Bharat Forge, TVS Motor और Tata Motors के शेयर 3% से ज़्यादा टूटे.

आगे क्या? अब पूरा खेल युद्ध पर निर्भर करेगा 

 oil और gas सप्लाई में बाधा और बढ़ती ब्याज दरें मिलकर ऑटो सेक्टर की कमाई पर असर डाल सकती हैं. जानकारों का कहना है कि अगर जंग 3 से 6 महीने और चली तो हालात और मुश्किल होंगे. गाड़ियों की कीमतें और बढ़ेंगी, कंपनियों के मुनाफे घटेंगे और EV की तरफ रुझान और तेज़ होगा.

ऑटो सेक्टर अभी दबाव में है. लागत बढ़ रही है और मांग अनिश्चित है. कंपनियां जितना हो सके दाम बढ़ाने से बच रही हैं, लेकिन बाज़ार धीरे-धीरे बदल रहा है,  पेट्रोल-डीज़ल की गाड़ियों से EV की तरफ.  यह बदलाव, जंग जितनी लंबी चलेगी, उतनी तेज़ रफ्तार पकड़ता जाएगा.



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