RBI MPC Meeting: भारतीय रिजर्व बैंक ने इस बार रेपो रेट में कोई बदलाव न करते हुए इसे 5.25 परसेंट पर बरकरार रखा. रिजर्व बैंक गवर्नर ने इसका ऐलान किया.उनकी अध्यक्षता में छह-सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक सोमवार को शुरू हुई. RBI MPC की यह बैठक एक ऐसे समय पर हुई, जब पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है, कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और रुपये में गिरावट आई है. ऐसे में उम्मीद है कि आरबीआई इस बार रेपो रेट को 5.25 परसेंट पर बरकरार रखेगा.
RBI ने फरवरी 2025 से अब तक रेट में कुल 125 बेसिस पॉइंट की कटौती की है. 2019 के बाद पहली बार रिजर्व बैंक ने इतनी तेजी के साथ दरों को नीचे लाया. फरवरी 2026 में हुई पिछली बैठक में रिजर्व बैंक ने दरों को स्थिर रखा था ताकि पहले हुई कटौतियों का आकलन किया जा सके. इससे पहले दिसंबर 2025 में रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती की थी.
कितना रहेगा GDP ग्रोथ?
RBI को उम्मीद थी कि FY27 में आर्थिक गतिविधियां अच्छी बनी रहेंगी. केंद्रीय बैंक ने Q1FY27 के लिए GDP में वृद्धि का अनुमान 6.7 परसेंट से बढ़ाकर 6.9 परसेंट कर दिया है, जबकि Q2FY27 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान पहले के 6.8 परसेंट से बढ़ाकर 7 परसेंट कर दिया. फरवरी की नीति में MPC ने Q1FY27 के लिए मुद्रास्फीति का अनुमान भी बढ़ाकर 4.0 परसेंट कर दिया और Q2FY27 के लिए मुद्रास्फीति का अनुमान 4.2 परसेंट कर दिया. RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इस दौरान यह भी कहा कि ग्रीनफील्ड FDI परियोजनाओं के लिए भारत एक आकर्षक गंतव्य बना हुआ है.
रेपो रेट क्या है?
रेपो रेट ब्याज की वह दर होती है, जिस पर देश का केंद्रीय बैंक कमर्शियल बैंक को उधार देता है. दरअसल, जब भी बैंकों के पास फंड की कमी होती है, वे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए RBI से पैसा उधार लेते हैं. इस उधार पर उन्हें जो ब्याज चुकाना पड़ता है उसे रेपो रेट कहते हैं. बाजार में महंगाई बढ़ने पर रिजर्व बैंक रेपो रेट बढ़ा देता है. इससे बैंकों के लिए कर्ज महंगा हो जाता है और बे ग्राहकों के लिए लोन की दरें बढ़ा देते हैं. कर्ज महंगा होगा, तो लोग खर्च कम करेंगे. इससे महंगाई को काबू में रखने में मदद मिलती है.
इसके विपरीत, जब अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ जाती है तो RBI रेपो रेट को घटा देता है ताकि लोगों को सस्ता लोन मिल सके और बाजार में खरीदारी को बढ़ावा मिले और निवेश ज्यादा से ज्यादा हो.
रेपो रेट का EMI से कनेक्शन
बैंक रेपो रेट के आधार पर ही लेडिंग रेट तय करते हैं. अगर बैंकों को RBI से सस्ता फंड मिलता है, तो बैंक भी अपने फ्लोटिंग रेट लोन पर ब्याज दरें कम कर देते हैं. अगर आपका लोन फ्लोटिंग रेट या रेपो-लिंक्ड है, तो बैंक ब्याज दर को कम कर देते हैं, जिससे लोन पर आपकी ईएमआई या तो कम हो जाती है या लोन का टेन्योर घट सकता है.
वहीं, जब रेपो रेट बढ़ता है तो बैंकों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है और इसका बोझ ग्राहकों पर डाल दिया जाता है. इससे लोन पर ईएमआई भी बढ़ जाती है. इस बार रेपो रेट स्थिर रखने का मतलब है कि आपकी अभी बैंक, होम या कार लोन पर जितनी ईएमआई चल रही थी, उतनी ही चलेगी. इसमें राहत की अभी गुंजाइश नहीं है.
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