नरेंद्रनगर राजमहल की खास परंपरा: तिल से बनता पवित्र गाडू घड़ा तेल, जिससे होता है बदरी विशाल का श्रृंगार!

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टिहरी जिले के नरेंद्रनगर राजमहल में हाल ही में एक विशिष्ट और पावन कार्यक्रम आयोजित किया गया. महारानी की देखरेख में सुहागिन महिलाओं द्वारा ओखली और मूसल से तिल पिरोकर गाडू घड़ा तेल तैयार किया गया.

इस पवित्र तेल को कलश में भरकर पारंपरिक रूप से बद्रीनाथ धाम ले जाया जाता है, जहां इसका उपयोग भगवान बदरी विशाल के अभिषेक और श्रृंगार में किया जाता है.

अभिषेक की परंपरा

गाडू घड़ा तेल का मुख्य महत्व भगवान बदरी विशाल के कपाट खुलने के दिन के अभिषेक से जुड़ा है. शीतकाल के बाद होने वाले पहले विशेष अभिषेक में इस तेल का प्रयोग किया जाता है. इसे भगवान की मूर्ति को स्नान कराने और श्रृंगार के लिए उपयोग किया जाता है.

यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे धार्मिक विश्वास और भक्ति का प्रतीक माना जाता है.

गाडू घड़ा यात्रा

तेल तैयार होने के बाद इसे कलश में रखा जाता है और नरेंद्रनगर से बद्रीनाथ धाम तक पारंपरिक गाडू घड़ा कलश यात्रा निकाली जाती है. यह यात्रा धार्मिक भक्ति और समुदाय के सहयोग का प्रतीक होती है. श्रद्धालु इस यात्रा में हिस्सा लेकर भगवान के प्रति अपनी निष्ठा और समर्पण दिखाते हैं.

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पवित्रता और शुचिता

तेल बनाने की पूरी प्रक्रिया महारानी की देखरेख में की जाती है. वे पीले वस्त्र धारण करके व्रत रखती हैं और सुहागिन महिलाएं पारंपरिक तरीके से तिलों से तेल निकालती हैं. यह प्रक्रिया न केवल धार्मिक श्रद्धा बल्कि शुचिता और समर्पण का प्रतीक भी है.

छह महीने तक श्रृंगार में उपयोग

गाडू घड़ा तेल का महत्व केवल अभिषेक तक सीमित नहीं है. यह तेल अगले छह महीने तक भगवान बदरी विशाल की सुबह की पूजा (ब्रह्म बेला) में श्रृंगार हेतु उपयोग किया जाता है. तेल का कलश कपाट खुलने से पहले ही बद्रीनाथ धाम पहुंच जाता है, जिससे भक्ति और परंपरा का संपूर्ण चक्र पूरा होता है.

नरेंद्रनगर राजमहल में महारानी की देखरेख में तिल से तैयार किया गया यह गाडू घड़ा तेल धार्मिक परंपरा, श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है. यह न केवल भगवान बदरी विशाल के अभिषेक और श्रृंगार में महत्व रखता है, बल्कि समुदाय और संस्कृति में जुड़ाव का भी एक मजबूत संदेश देता है.

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