- आईपीएल चियरलीडर बनने के लिए डिग्री नहीं, डांस कौशल महत्वपूर्ण.
- चियरलीडर के लिए कोई आधिकारिक कोर्स नहीं, पर ट्रेनिंग जरूरी.
- टैलेंट एजेंसियां भर्ती करती हैं, ऑडिशन से होता है चयन.
- कड़ी मेहनत, फिटनेस और स्टैमिना के साथ घंटों प्रदर्शन.
IPL Cheerleaders Qualification: आईपीएल के मैचों के दौरान जब भी कोई बल्लेबाज चौका या छक्का मारता है, तो दर्शकों की नजरें तुरंत बाउंड्री लाइन पर थिरकती चियरलीडर्स पर टिक जाती हैं. वे अपने बेहतरीन डांस और गजब की ऊर्जा से पूरे स्टेडियम का माहौल बदल देती हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि चियरलीडर बनने के लिए आखिर कितनी पढ़ाई करनी पड़ती है? या फिर क्या इस पेशे में आने के लिए किसी खास तरह का कोर्स करना होता है? आइए जानते हैं आईपीएल चियरलीडर्स के चयन, उनकी योग्यताओं और इस काम से जुड़ी हर छोटी-बड़ी सच्चाई को.
डिग्री नहीं टैलेंट की होती है मांग
आईपीएल में चियरलीडर बनने के लिए किसी भी तरह की विशेष या बड़ी शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता बिल्कुल नहीं है. इस क्षेत्र में आने के लिए कोई यह नहीं देखता कि आपने कितनी पढ़ाई की है या आपके पास कौन सी डिग्री है. यहां चयन का मुख्य आधार आपकी पढ़ाई के बजाय आपकी डांसिंग स्किल्स, शारीरिक फिटनेस और आपकी उम्र होती है. आमतौर पर 18 से 30 वर्ष की उम्र के बीच की लड़कियां ही इस पेशे में आती हैं, जिन्हें डांस और परफॉर्मिंग आर्ट्स की अच्छी समझ होती है.
कोई आधिकारिक कोर्स नहीं पर ट्रेनिंग जरूरी
अगर आप यह सोचते हैं कि चियरलीडर बनने के लिए किसी मान्यता प्राप्त कॉलेज से कोई खास कोर्स करना पड़ता है, तो आप गलत हैं. इस पेशे के लिए कोई तय या सरकारी कोर्स मौजूद नहीं है. हालांकि, चियरलीडर बनने के लिए आपको डांस की विभिन्न शैलियों जैसे हिप-हॉप, जैज और कंटेम्परेरी में महारत हासिल करनी होती है. इसलिए, पेशेवर डांस स्कूलों या टैलेंट अकादमियों से ली गई हाई-लेवल ट्रेनिंग इस काम में सबसे ज्यादा काम आती है. आपका हुनर ही आपकी सबसे बड़ी योग्यता मानी जाती है.
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कौन करता है इनकी भर्ती?
आईपीएल चियरलीडर्स की भर्ती सीधे बीसीसीआई या आईपीएल टीमें नहीं करती हैं. इसके लिए बड़ी-बड़ी इवेंट मैनेजमेंट और टैलेंट एजेंसियां काम करती हैं. ये कंपनियां दुनिया भर की प्रोफेशनल डांसिंग एजेंसियों से संपर्क करती हैं. इच्छुक कलाकारों को अपनी डांसिंग और परफॉर्मेंस का एक प्रोफेशनल वीडियो सबमिट करना होता है। इसके बाद कंपनियों द्वारा लाइव ऑडिशन आयोजित किए जाते हैं, जिसमें परफॉर्मेंस, कैमरे के सामने आत्मविश्वास और स्टेज प्रेजेंस को परखने के बाद ही फाइनल सिलेक्शन होता है.
घंटों तक थिरकने की चुनौती
चियरलीडर का काम जितना ग्लैमरस दिखता है, इसके पीछे उतनी ही कड़ी मेहनत छिपी होती है. एक मैच करीब 3 से 4 घंटे तक चलता है और इस दौरान जब भी कोई बड़ा शॉट लगता है या विकेट गिरता है, तो उन्हें तुरंत स्टेज पर आकर पूरी ऊर्जा के साथ डांस करना होता है. इसके लिए गजब की फिटनेस और स्टैमिना की जरूरत होती है. जरा सी थकान भी उनके परफॉर्मेंस पर असर डाल सकती है. इसलिए उनका शारीरिक रूप से फिट होना और लगातार अभ्यास करना बेहद अनिवार्य है.
चीयरलीडिंग की शुरुआत कैसे हुई?
चीयरलीडिंग की जड़ें भारत में नहीं बल्कि अमेरिका में हैं. इसकी शुरुआत साल 1898 में यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा में हुई थी, जहां दर्शकों का जोश बढ़ाने के लिए एक संगठित तरीका अपनाया गया. दिलचस्प बात यह है कि शुरुआती समय में यह काम सिर्फ पुरुष करते थे. 20वीं सदी के आते-आते इसमें महिलाओं की भागीदारी बढ़ी और इसे एक पेशेवर कला का रूप मिल गया. भारत में यह चलन साल 2008 में आईपीएल के पहले सीजन के साथ आया, जिसने क्रिकेट और मनोरंजन को एक साथ जोड़ दिया.
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