‘खाना तक नहीं मिलता’, प्रोडक्शन हाउस की कंजूसी पर अर्चना पूरण सिंह का फूटा गुस्सा, बताई सच्चाई

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फिल्म इंडस्ट्री की चमक-दमक के पीछे की सच्चाई एक बार फिर सामने आई है. लंबे वर्किंग आवर्स और सेट पर सुविधाओं की कमी को लेकर अब कलाकार खुलकर बोल रहे हैं. हाल ही में एक बातचीत के दौरान अर्चना पूरण सिंह ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रखी और बताया कि कैसे फिल्म सेट्स पर काम करने वाले लोगों को कई बार जरूरी सुविधाएं भी नहीं मिलती हैं.

अर्चना ने कुछ प्रोडक्शन हाउस को बताया कंजूस 

अर्चना पूरण सिंह ने न्यूज 18 से बातचीत में प्रोडक्शन हाउस के बारे में कहा कि शूटिंग के बीच काम के घंटे हमेशा तय समय से ज्यादा बढ़ जाते हैं. कई बार 12 घंटे से भी ज्यादा काम करना पड़ता है और इसे बढ़ाकर 13-14 घंटे तक कर दिया जाता है. वो हमसे 13-14 घंटे काम करवाते हैं और कई बार लंच ब्रेक भी नहीं देते. ये पूरी तरह से कंजूसी है. कंजूसी सिर्फ पैसों की नहीं, सोच की होती है. जो लाइटमैन धूप में घंटों खड़े रहते हैं, उन्हें खाना तक ठीक से नहीं मिलता. उनके पास कोई असिस्टेंट नहीं होता, जो उन्हें फल या कुछ और दे सके. ये बहुत गलत है. कुछ प्रोडक्शन हाउस तो खाने को लेकर इतने सख्त होते हैं कि लोग मजाक में उन्हें उनके खाने के हिसाब से पहचानने लगते हैं.’

कई कलाकारों ने भी उठाई आवाज 

इसके अलावा सान्या मल्होत्रा ने कहा कि कई बार इतनी भागदौड़ में शूटिंग होती है कि जरूरी ब्रेक्स, जैसे लंच टाइम को भी नजरअंदाज कर दिया जाता है. वहीं राजकुमार राव का मानना है कि अगर शेड्यूल को सही तरीके से प्लान किया जाए, तो समय पर खाना और आराम देना बिल्कुल पॉसिबल है. सेट पर काम करने वाले हर व्यक्ति की सेहत और आराम का ध्यान रखना जरूरी है. साथ ही अभिषेक बनर्जी ने भी कहा कि ये छोटी-छोटी बातें असल में बड़ी सोच को दिखाती हैं, जहां खर्च बचाने के चक्कर में लोगों की बुनियादी जरूरतें पीछे रह जाती हैं.

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दीपिका ने भी की थी मांग 

बता दें कि ये कोई नया मामला नहीं है. इससे पहले भी कई कलाकार इस पर आवाज उठा चुके हैं. पिछले साल दीपिका पादुकोण ने भी लंबे वर्किंग आवर्स को लेकर चिंता जताई थी. खबरों के मुताबिक, उन्होंने कुछ प्रोजेक्ट्स इसलिए छोड़ दिए थे क्योंकि उनकी 8 घंटे की शिफ्ट की मांग पूरी नहीं हो सकी. उन्होंने पहले भी कहा था कि इंडस्ट्री में जरूरत से ज्यादा काम करना नॉर्मल बन चुकी है, जिसे बदलने की जरूरत है.

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