Explained: पेट्रोल-डीजल-CNG महंगा, एल नीनो से फसलें बर्बाद और बढ़ेगी EMI! आखिर क्या है ‘महंगाई का दुष्चक्र’?

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एक सुबह अखबार के पहले पन्ने पर छपा होता है- ‘थोक महंगाई दर रिकॉर्ड 8.30 फीसदी पर पहुंची.’ उसी अखबार के दूसरे पन्ने पर एक और खबर होती है- ‘RBI ने आने वाले महीनों में रेपो रेट की बढ़ोतरी के संकेत दिए.’ फिर शाम को जब आप पेट्रोल पंप पर जाते हैं, तो पता चलता है कि डीजल और CNG भी 4-5 रुपये महंगे होने वाले हैं. आपको लगे कि ये सब अलग-अलग मुसीबतें हैं, लेकिन असल में ये तीनों एक ही बेहद खतरनाक जंजीर की तीन कड़ियां हैं, जिसे अर्थशास्त्री ‘महंगाई का दुष्चक्र’ कहते हैं. ये एक ऐसा फंदा है जो पश्चिम एशिया के युद्ध और अल नीनो की मार से शुरू होता है, लेकिन कैसे?

पहली चिंगारी: पेट्रोल-डीजल-CNG में आग और अल नीनो की मार

महंगाई का ये दुष्चक्र दो बड़े धक्कों से शुरू होता है:

1. ईंधन की कीमतों में बेकाबू उछाल

इस वक्त पूरी दुनिया में पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव और युद्ध के हालात. इस संकट ने ‘होर्मुज स्ट्रेट’ से तेल की सप्लाई को बुरी तरह प्रभावित किया है, जहां से दुनिया का करीब 20 फीसदी तेल गुजरता है. नतीजा ये हुआ कि कच्चे तेल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल से उछलकर 126 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गईं.

इसका सीधा असर भारत के थोक बाजार पर पड़ा. अप्रैल 2026 में देश की थोक महंगाई दर (WPI) उछलकर 8.30% पर पहुंच गई, जो पिछले साढ़े तीन साल (42 महीने) का सबसे ऊंचा स्तर है. मार्च 2026 में ये दर महज 3.88% थी, यानी सिर्फ एक महीने में दोगुने से भी ज्यादा का उछाल.

इस पूरी बढ़त में सबसे बड़ा हाथ ‘ईंधन और बिजली’ सेक्टर का रहा, जिसकी महंगाई दर सीधे 24.71% तक जा पहुंची, जबकि मार्च में ये सिर्फ 1.05% थी. अकेले कच्चे तेल की थोक महंगाई दर 88.06% और पेट्रोल की   32.40% तक पहुंच गई. बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस के मुताबिक, ‘युद्ध रुकने के कोई संकेत नहीं हैं, जिससे तेल की कीमतें 100-120 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में बनी रहेंगी और WPI महंगाई ऊंची बनी रहेगी.’ रेटिंग एजेंसी ICRA ने तो यहां तक कहा कि मई में थोक महंगाई और बढ़ सकती है.

2. अल नीनो का खतरनाक साया

ऊपर से, मौसम विभाग (IMD) ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के सामान्य से कम (लॉन्ग पीरियड एवरेज का सिर्फ 92%) रहने का अनुमान जताया है. इसकी सबसे बड़ी वजह ‘सुपर अल नीनो’ है. ये एक ऐसी मौसमी घटना है जिसमें प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है, जिससे मानसून की हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं और बारिश कम होती है. मई से जुलाई 2026 के बीच इसके सक्रिय होने की 61% संभावना जताई गई है.

इसका सीधा मतलब है- फसलों का उत्पादन घटेगा. खासकर धान, सोयाबीन और कपास जैसी प्रमुख फसलें प्रभावित होंगी, जिससे खाद्य महंगाई बढ़ेगी.

दूसरा झटका: कंपनियों से होता हुआ बोझ आप तक पहुंचना

ये बढ़ी हुई लागत सीधे आप तक नहीं पहुंचती, बल्कि एक चेन के जरिए आती है:

1. थोक विक्रेता और कंपनियां

WPI के आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ ईंधन ही नहीं, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर भी प्रभावित हुआ है. मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की महंगाई दर मार्च के 3.39% से बढ़कर अप्रैल में 4.62% पर पहुंच गई, जो 43 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है. WPI के तहत ट्रैक होने वाले 22 में से 21 मैन्युफैक्चरिंग ग्रुप्स में अप्रैल में कीमतें बढ़ीं. प्राइमरी आर्टिकल्स (कच्चा माल) की महंगाई भी 6.36% से बढ़कर 9.17% हो गई.

2. ग्राहक यानी आप पर बोझ

जब कच्चा तेल ही 88% महंगा हो जाएगा, तो पेट्रोल-डीजल बनाने वाली कंपनियों की लागत भी उतनी ही बढ़ जाएगी. RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने साफ कहा है, ‘तेल कंपनियां ज्यादा समय तक ये नुकसान नहीं झेल सकतीं.’ तेल कंपनियों को हर महीने करीब 30,000 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है. एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि 15 मई 2026 के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 4 से 5 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हो सकती है.

पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते ही ट्रांसपोर्ट महंगा हो जाता है. फिर चाहे सब्जी हो, दूध हो या कोई भी सामान. सबकी ढुलाई का खर्च बढ़ जाता है. एक अनुमान के मुताबिक, अगर डीजल सिर्फ 5 रुपए प्रति लीटर महंगा होता है, तो माल ढुलाई की लागत 3% तक बढ़ जाती है.

आखिरी वार: RBI की मजबूरी और बढ़ती EMI

यहां से शुरू होता है असली ‘दुष्चक्र’, जो आम आदमी की कमर तोड़ देता है:

1. RBI की चुनौती और आपकी EMI

RBI का काम है महंगाई को काबू में रखना. अभी रेपो रेट   5.25% पर स्थिर है, लेकिन RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई (CPI) का अनुमान 4.6% लगाया है. तीसरी तिमाही (Q3) में इसके 5.2% तक पहुंचने की आशंका जताई है. WPI के 8.30% पर पहुंचने के बाद अब दबाव और बढ़ गया है. बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकोनॉमिस्ट ने आगाह किया है कि WPI महंगाई कुछ समय बाद ऊंची इनपुट लागत के जरिए CPI यानी खुदरा महंगाई में भी तब्दील हो जाती है.

2. रेपो रेट बढ़ने का सीधा असर

रेपो रेट वो दर है जिस पर RBI बैंकों को कर्ज देता है. जब RBI इस दर को बढ़ाता है, तो बैंकों के लिए पैसा महंगा हो जाता है और ये बोझ बैंक आप पर डालते हैं. इसका नतीजा ये होता है कि आपके होम लोन, कार लोन या किसी भी तरह की EMI की रकम बढ़ जाती है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर महंगाई काबू में आती है तो 2026 के आखिर या 2027 की शुरुआत में ही EMI में राहत मिल सकती है. RBI ने फिलहाल ‘प्रतीक्षा करो और देखो’ की रणनीति अपनाई है, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट में तनाव बढ़ने से महंगाई और बढ़ने की आशंका ने स्थिति को और मुश्किल बना दिया है.

आखिर ये महंगाई का ‘दुष्चक्र’ क्यों है?

ये पूरी प्रक्रिया एक जाल की तरह काम करती है और हर कड़ी आपस में जुड़ी है:

  • बाहरी झटका: पश्चिम एशिया में तनाव और अल नीनो जैसे कारणों से ईंधन और खाने-पीने की चीजें महंगी होती हैं. WPI 8.30% पर और फ्यूल एंड पावर महंगाई 24.71% पर.
  • लागत का हस्तांतरण: कंपनियों और थोक विक्रेताओं की लागत बढ़ती है (मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स महंगाई 4.62%), जिसका बोझ वो ग्राहकों पर डालते हैं. 15 मई से पेट्रोल-डीजल में 2-3 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ोतरी हुई है.
  • RBI की कार्रवाई: बढ़ती महंगाई (CPI अनुमान 4.6%, Q3 में 5.2% तक) को रोकने के लिए RBI रेपो रेट बढ़ाने पर मजबूर हो सकता है.
  • आम आदमी पर दोहरी मार: नतीजा ये होता है कि एक तरफ आपकी रोजमर्रा की जिंदगी का खर्च बढ़ जाता है (पेट्रोल से लेकर सब्जी तक). दूसरी तरफ आपकी चुकाई जा रही EMI की रकम भी बढ़ने का खतरा मंडराने लगता है.

इसे ही ‘महंगाई का दुष्चक्र’ कहते हैं, जहां एक समस्या दूसरी को जन्म देती है और आखिर में पूरा बोझ आम आदमी की जेब पर आकर गिरता है. फिलहाल सरकार और तेल कंपनियां इस बोझ को आप तक आने से रोकने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन जैसा कि RBI गवर्नर ने साफ कहा, कीमतों में बढ़ोतरी अब ‘सिर्फ समय की बात’ है.



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