Explained: पेट्रोल-डीजल से लेकर EMI तक! आपकी जेब पर कैसे पड़ रही है डबल मार? एक्सपर्ट से समझिए पूरा गणित

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अमेरिका और ईरान जंग ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को हिला कर रख दिया. इसका सीधा और तेज असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है, जो आसमान छू रही हैं. महंगे तेल ने भारतीय रुपये को कमजोर कर दिया. इन सबके बीच, भारत सरकार ने लोगों से सोना खरीदने से बचने, ईंधन बचाने और विदेश यात्राएं टालने जैसी अपीलें की हैं. अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि इस पूरे घटनाक्रम का आपकी रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा और आने वाले दिनों में आपकी EMI का क्या होगा? इन्हीं तमाम सवालों के जवाब जानने के लिए ABP न्यूज ने फाइनेंशियल एक्सपर्ट और चार्टर्ड अकाउंटेंट विकास कुमार तिवारी से बात की. आइए, उन्हीं के शब्दों में समझते हैं पूरा लेखा-जोखा…

सवाल 1: पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों का आम आदमी की जेब पर कितना असर पड़ेगा?

एक्सपर्ट की राय: इसका असर बहुत गहरा और हर तरफ फैलने वाला है. सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में जो बढ़ोतरी का फैसला किया है, वो सिर्फ आपकी गाड़ी के ईंधन तक सीमित नहीं रहेगा. दरअसल, पेट्रोल-डीजल महंगा होने का मतलब है कि हर उस चीज की ढुलाई महंगी हो जाएगी जो सड़क के रास्ते आप तक पहुंचती है- चाहे वो सब्जी हो, दूध हो या कोई किराने का सामान.

एक आम आदमी के लिए, ईंधन की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी उसके पूरे महीने के बजट को गड़बड़ा सकती है. जो लोग अपनी प्राइवेट गाड़ी से ऑफिस जाते हैं, उनका आने-जाने का खर्च सीधे बढ़ जाएगा. वहीं, ऑटो या बस जैसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट का किराया भी बढ़ना लगभग तय है. इस बढ़ी हुई लागत का सबसे बुरा असर मिडिल क्लास और गरीब परिवारों पर पड़ेगा, क्योंकि उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा पहले से ही खाने-पीने और आने-जाने पर खर्च होता है. अब उनके पास बचत या दूसरी चीजों के लिए पैसे कम बचेंगे.

हालांकि, ये असर कितने समय तक रहेगा, ये दो बातों पर निर्भर करेगा:

  • अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कब तक स्थिर होती हैं.
  • क्या सरकार टैक्स में राहत या सब्सिडी जैसे कदम उठाकर इस बोझ को कम करने की कोशिश करती है.

फिलहाल ये बढ़ोतरी आपकी खर्च करने की क्षमता को कम करेगी और बाजार में मांग को कमजोर करेगी.

सवाल 2: खुदरा महंगाई में बढ़ोतरी से लोगों के खर्च और पूरे बाजार पर क्या असर पड़ेगा?

एक्सपर्ट की राय: जब चीजों के दाम बढ़ते हैं, तो इसका मतलब सिर्फ इतना नहीं है कि आपको दुकानदार को ज्यादा पैसे देने पड़ रहे हैं. ये एक बड़ा संकेत है कि पूरी अर्थव्यवस्था में जीवनयापन का खर्च लगातार बढ़ रहा है. थोक महंगाई, जो कि कच्चे माल और उत्पादन की लागत को दिखाती है, देर-सवेर खुदरा महंगाई की कीमतों में बदल जाती है. इसका नतीजा ये होता है कि लोगों की खरीदने की ताकत कम हो जाती है और वो अपने खर्च करने की आदतों में बदलाव लाने को मजबूर हो जाते हैं.

घरेलू स्तर पर देखें, तो बढ़ती महंगाई का मतलब है कि खाने-पीने, बिजली, अस्पताल के खर्चे और रोजमर्रा के सामान पर ज्यादा खर्च करना पड़ेगा. जैसे-जैसे जरूरी चीजें महंगी होंगी, लोग मनोरंजन, बाहर खाना या कोई नई गाड़ी जैसी गैर-जरूरी चीजों पर खर्च कम करने लगेंगे. इसका सीधा असर बाजार में मांग पर पड़ता है और कई सेक्टर्स में बिक्री घट सकती है.

बाजार के नजरिए से ये लगातार ऊंची महंगाई कारोबारियों और निवेशकों के लिए अनिश्चितता का माहौल पैदा करती है. जिन कंपनियों का काम ईंधन, परिवहन और आयातित कच्चे माल पर ज्यादा निर्भर है, उनकी लागत बढ़ने से उनका मुनाफा घट जाता है. इसके अलावा, अगर महंगाई लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है, तो ये उम्मीद बनने लगती है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है. जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो कंपनियों और आम आदमी दोनों के लिए लोन लेना महंगा हो जाता है, जिससे आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है. हालांकि, तेल और कमोडिटी जैसे कुछ सेक्टर ऊंची कीमतों की वजह से अल्पकाल में मुनाफा कमा सकते हैं, लेकिन पूरी अर्थव्यवस्था के लिए ये स्थिति अच्छी नहीं है.

सवाल 3: क्या प्रधानमंत्री की अपील से रुपये को फायदा होगा?

एक्सपर्ट की राय: अगर बड़ी संख्या में लोग और संस्थान PM मोदी की अपील पर अमल करते हैं, तो इसका भारतीय रुपये पर निश्चित रूप से सकारात्मक असर पड़ सकता है. इसके पीछे का गणित बहुत सीधा है. भारत, दुनिया में सोने और कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है. जब हम ये चीजें खरीदते हैं, तो हमें विदेशों को अमेरिकी डॉलर में भुगतान करना पड़ता है. इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और हमारा विदेशी मुद्रा भंडार घटता है, जिससे रुपया कमजोर होता है.

अगर लोग सोना खरीदना कम कर दें, विदेश यात्राओं पर जाना टाल दें और वर्क फ्रॉम होम करके पेट्रोल-डीजल की खपत घटा दें, तो इसका सीधा मतलब होगा कि हमारा आयात बिल कम हो रहा है. जब आयात कम होगा, तो डॉलर की मांग भी घटेगी. इससे देश के चालू खाता घाटे (करंट अकाउंट डेफिसिट) पर लगाम लगेगी और रुपये पर दबाव कम होगा. इसके अलावा, ये अपील एक संदेश भी देती है कि देश आर्थिक चुनौतियों का सामना जिम्मेदारी से करने की कोशिश कर रहा है. इससे निवेशकों का भरोसा बढ़ता है और इसका फायदा भी रुपये को मिलता है.

लेकिन, ये समझना जरूरी है कि ये सब केवल छोटे समय के उपाय हैं. लंबे समय तक रुपये को मजबूत बनाए रखने के लिए सिर्फ अपीलों से काम नहीं चलेगा. इसके लिए बड़े आर्थिक सुधारों, मजबूत निर्यात, स्थिर विदेशी निवेश, कंट्रोल में रहने वाली महंगाई और एक संतुलित वित्तीय प्रबंधन की जरूरत होगी.

सवाल 4: अगर रुपया लगातार कमजोर होता रहा, तो इसका आम जिंदगी पर क्या असर होगा?

एक्सपर्ट की राय: रुपये की लगातार गिरावट का मतलब है, आपकी जेब पर डबल मार. भारत अपनी जरूरत का करीब 90% कच्चा तेल, ढेर सारा इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी और केमिकल जैसी चीजें बाहर से मंगाता है. इन सबका पेमेंट डॉलर में होता है. जब रुपया कमजोर होता है, तो इन्हीं चीजों को खरीदने के लिए हमें ज्यादा रुपये चुकाने पड़ते हैं. नतीजतन महंगाई बढ़ती है.

इसका सबसे पहला और बड़ा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दिखता है. महंगा ईंधन परिवहन को महंगा बनाता है, जिससे खाने-पीने की चीजों से लेकर हर उत्पाद की कीमत बढ़ जाती है. इसके अलावा, आपका मोबाइल फोन, लैपटॉप, दवाइयां और गाड़ी जैसी चीजें भी महंगी हो जाएंगी. जिन परिवारों के बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं, उनके लिए तो फीस और रहने का खर्च अचानक से बहुत बढ़ जाएगा.

इसी तरह, जिन कंपनियों पर डॉलर का कर्ज है, उनकी मुश्किलें बढ़ जाएंगी. हालांकि, एक फायदा भी है. IT, फार्मा और टेक्सटाइल जैसी निर्यात करने वाली कंपनियों को कमजोर रुपये से फायदा होता है, क्योंकि उन्हें विदेशों से डॉलर में जो भुगतान मिलता है, रुपयों में उसकी कीमत ज्यादा हो जाती है. सरकार और RBI के पास रुपये की गिरावट रोकने के लिए 6 बड़े हथियार हैं:

  • विदेशी मुद्रा बाजार में दखल देकर डॉलर बेच सकते हैं.
  • विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं.
  • गैर-जरूरी आयात को हतोत्साहित कर सकते हैं.
  • ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों के तहत देश में ही मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना.
  • महंगाई और राजकोषीय घाटे पर लगाम रखना.
  • नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ाकर तेल आयात पर निर्भरता कम करना.

सवाल 5: RBI को जून की MPC बैठक में रेपो रेट बढ़ाना चाहिए या इसे जस का तस रखना चाहिए?

एक्सपर्ट की राय: RBI के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती है, एक ऐसा फैसला लेना जो महंगाई को कंट्रोल करे और आर्थिक विकास की रफ्तार को भी बनाए रखे. थोक महंगाई में भारी उछाल और दुनिया भर की आर्थिक अनिश्चितताओं को देखते हुए RBI के सतर्क रुख अपनाने की पूरी संभावना है.

अगर रेपो रेट बढ़ाया जाता है, तो इससे बाजार में नकदी कम होगी और कर्ज महंगा हो जाएगा. इससे लोगों की खरीदने की क्षमता कम होगी और मांग घटने से महंगाई को काबू करने में मदद मिल सकती है. ऊंची ब्याज दरों से विदेशी निवेशक भी आकर्षित होंगे, जिससे रुपये को सहारा मिलेगा. लेकिन, इसका नुकसान ये होगा कि आपके होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन की EMI बढ़ जाएगी. कंपनियों के लिए नया कर्ज लेना महंगा हो जाएगा, जिससे निवेश और रोजगार के अवसरों पर ब्रेक लग सकता है.

दूसरी तरफ, अगर RBI दरों में कोई बदलाव नहीं करता, तो इससे आर्थिक विकास को गति मिलती रहेगी. ये उन सेक्टर्स के लिए राहत की बात होगी जो पहले से बढ़ती लागत और कमजोर मांग से जूझ रहे हैं. फिलहाल, जो महंगाई बढ़ी है, वो मुख्य रूप से सप्लाई साइड की वजहों से है, जैसे कि तेल की कीमतें. ऐसे में सिर्फ ब्याज दरें बढ़ा देने से समस्या की जड़ पर तो नहीं जाया जा सकता.

सबसे सही रणनीति संतुलन बनाने की है. अगर महंगाई लंबे समय तक ऊंची रहती है और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बनती है, तो सीमित मात्रा में रेपो रेट बढ़ाना जरूरी हो सकता है. लेकिन, अगर RBI को लगता है कि ये महंगाई अस्थायी और बाहरी वजहों से है, तो वो मौजूदा दरों को बनाए रखते हुए हालात पर करीबी नजर रखने की नीति अपना सकता है. कुल मिलाकर, RBI का फैसला इन चार चीजों के बीच एक बारीक संतुलन बैठाने की कोशिश होगी- महंगाई पर काबू, रुपये की स्थिरता, बाजार का भरोसा और आर्थिक विकास की रफ्तार.



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