Student Mental Stress: माता-पिता छात्रों में मानसिक तनाव के शुरुआती लक्षणों को कैसे पहचान सकते हैं?

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Student Mental Stress: देश भर में बोर्ड और प्रवेश परीक्षाओं के परिणाम घोषित होते ही, ऐसे में कई घरों में गर्व, राहत, निराशा, चिंता और अनिश्चितता जैसी मिली-जुली भावनाएं देखने को मिलेंगी. कई स्टूडेंट्स बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर तनाव, डर और चिंता से जूझ रहे होते हैं. हाल ही में आई एक रिपोर्ट में बताया गया कि कई बच्चे अपने मन की बात घरवालों से भी नहीं कह पाते, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि लोग उन्हें कमजोर समझेंगे. ऐसे में माता-पिता के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि बच्चे के व्यवहार में छोटे-छोटे बदलाव भी मानसिक तनाव का संकेत हो सकते हैं. 

बच्चों में दिखने लगते हैं ये शुरुआती संकेत

मानसिक तनाव अचानक नहीं आता, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ता है. सबसे पहले बच्चे के स्वभाव और आदतों में बदलाव दिखने लगता है. जैसे बच्चा चिड़चिड़ा रहने लगे, अकेला रहने लगे, दोस्तों या परिवार से दूरी बनाने लगे या पहले जिन चीजों में मजा आता था उनमें अब रुचि न दिखाए. कई बच्चों की नींद खराब होने लगती है, भूख कम हो जाती है या बार-बार सिर और पेट दर्द जैसी शिकायतें होने लगती हैं. कुछ बच्चे हर समय परफेक्ट बनने का दबाव महसूस करते हैं, जबकि कुछ पढ़ाई से पूरी तरह मन हटाने लगते हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन संकेतों को सिर्फ मूड समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. 

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क्यों नहीं बता पाते बच्चे अपने दिल की बात?

कई स्टूडेंट्स अपने माता-पिता को परेशान नहीं करना चाहते, इसलिए चुपचाप तनाव सहते रहते हैं.  सोशल मीडिया, दूसरों से तुलना, अच्छे कॉलेज का दबाव और हर समय सफल दिखने की होड़ बच्चों के मन पर असर डाल रही है.  कुछ बच्चों को लगता है कि अगर उनके नंबर कम आए तो लोग उन्हें कम समझेंगे. यही वजह है कि वे अपने डर और चिंता को छिपाने लगते हैं. सोशल मीडिया पर भी कई स्टूडेंट्स ने माना कि जब उन्होंने घर पर तनाव की बात की, तो उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया. ऐसे माहौल में बच्चे खुद को अकेला महसूस करने लगते हैं. 

माता-पिता ऐसे बन सकते हैं बच्चों का सबसे बड़ा सहारा

विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को डांटने या हर समय नंबरों की बात करने के बजाय उन्हें समझने की जरूरत है. माता-पिता को बच्चों से रोज खुलकर बात करनी चाहिए और ऐसा माहौल बनाना चाहिए जहां बच्चा बिना डर अपनी बात कह सके. साथ ही  बच्चों की तुलना दूसरों से नहीं करनी चाहिए और सिर्फ रिजल्ट नहीं, बल्कि उनकी मेहनत की भी तारीफ करनी चाहिए.  अगर बच्चा उदास दिखे या उसके व्यवहार में लंबे समय तक बदलाव नजर आए, तो उसे नजरअंदाज न करें.  कई बार सिर्फ प्यार से सुन लेना भी बच्चे का आधा तनाव कम कर देता है.  बच्चों को यह एहसास होना चाहिए कि उनकी पहचान सिर्फ नंबरों से नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व और मेहनत से होती है. 

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