बाल नोचकर क्यों बनते हैं जैन साधु? जानिए दर्द से मुक्ति की खौफनाक लेकिन सच्ची कहानी!


आज की तेजी से भागती-दौड़ती दुनिया में जैन भिक्षु का जीवन त्याग से शुरू होता है. हाल ही में मशहूर यूट्यूबर और पॉडकास्टर रणवीर अल्लाहबादिया के साथ एक बातचीत में आध्यात्मिक वैज्ञानिक डॉ. मुनि आदर्श ने जैन भिक्षु बनने की बात शेयर की.

पॉडकास्ट में उन्होंने जैन धर्म के बारे में कई ऐसी जानकारी दी, जिसके बारे में हर किसी को जानना चाहिए. इस दौरान उन्होंने यह भी बताया कि, जैन दर्शन पर अभी और भी कई चर्चाओं की जरूरत है. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि, कैसे जीवनशैली में साधारण बदलावों से निर्भरता से मुक्ति मिली और एक शांत और सचेत जीवनशैली अपनाई गई. 

आराम का त्याग करना क्यों जरूरी?

रणवीर के साथ बातचीत में जैन आध्यात्मिक गुरु डॉ. मुनि आदर्श ने बताया कि, आज के समय में कई लोगों के लिए वाहनों जैसी रोजमर्रा की विलासिता या आधुनिक जीवन की सुख-सुविधाओं को त्यागना काफी अकल्पनीय लगता है. इसके विपरीत जैन भिक्षुओं को जो बात अलग करती है, वह यह है कि, वे हर स्थान पर पैदल चलना पसंद करते हैं, सादगी को सच्चे रूप में अपनाते हैं. 

उन्होंने बताया कि, एक जैन भिक्षु के रूप में वे कहीं आने-जाने के लिए गाड़ियों का इस्तेमाल नहीं करते हैं, बल्कि पैदल चलना पसंद करते हैं. उन्होंने कहा कि, कभी-कभी जीवनशैली के छोटे चुनाव ही किसी के जीवन के निर्णायक सिद्धांत बन जाते हैं. जैन भिक्षु के रूप में अपनी यात्रा के बारे में बताते हुए उन्होंने एक कठिन अनुष्ठान के बारे में जानकारी साझा की, जो काफी कष्ट सहने को प्रेरित करता है. 

केश लोचन अनुष्ठान

जैन संन्यासी जीवन की सबसे गहरी प्रथाओं में से एक है केश लोचन, जिसमें बालों को छोटे-छोटे गु्च्छों में हाथ से नोचा जाता है. सामान्य रूप से बाल कटवाने के विपरीत, यह क्रिया जानबूझकर और प्रतीकात्मक रूप से की जाती है, जिसमें कई बार रक्तस्राव (bleeding) होता है. केश लोचन अनुष्ठान दिखावे और शारीरिक आसक्ति को त्यागने का प्रतीक है, जो इस विचार को पुष्ट करता है कि, शरीर क्षणभंगुर है. 

डॉ. आदर्श ने कहा कि, इस प्रक्रिया से गुजरने वालों के लिए दर्द असहनीय हो सकता है. इसे अचानक लगे एक भयानक शारीरिक आघात के समान बताया गया है. फिर भी, बेहोश होने या पीछे हटने के बजाय अभ्यास करने वाले कुछ अप्रत्याशित अनुभव करते हैं. उनका मन बदल जाता है, और दर्द से व्याकुल होने के बावजूद वे उससे ऊपर उठते हैं. 

डॉ. आदर्श कहते हैं कि, उस तीव्रता के पल में दर्द आध्यात्मिक विकास के लिए एक साधन बन जाता है. उन्होंने बताया कि, अभ्यासी आमतौर पर जागरुकता की उच्च अवस्था में जाने के बारे में बताते हैं, जहां शारीरिक पीड़ा अपनी ताकत खो देती है. यह एहसास बन जाता है कि इंसान का शरीर मन की अनुमति से कहीं ज्यादा सह सकता है. 

उन्होंने बताया कि, अधिकतर लोगों के लिए दर्द एक ऐसी चीज है, जिससे हर कीमत पर बचना चाहिए. लेकिन जैन साधु की यात्रा इस सोच को चुनौती देती है. यह बताती है कि, तकलीफ के आगे ताकत है और डर के आगे स्वतंत्रता है. दर्द का सीधे सामना करके, कोई न सिर्फ सहनशक्ति पा सकता है, बल्कि मन की शांति और आजादी का गहरा एहसास भी पा सकता है. 

जैन साधुओं के लिए ऐसी प्रैक्टिस खुद को तकलीफ देने के बारे में नहीं है, बल्कि आजादी के बारे में हैं, तकलीफ के डर और शरीर की सीमाओं से खुद को आजाद करना है. ऐसा करके वे हम बाकी लोगों के लिए एक बुनियादी सवाल को चुनौती देते हैं. 

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