Parent-Child Relationship: बच्चों को डांटने के बाद पेरेंट्स भूलकर भी न करें ये गलती, टूट सकता है भरोसे का रिश्ता

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How To Rebuild Trust With Children After Discipline: बच्चों और माता-पिता के रिश्ते में तकरार होना बिल्कुल सामान्य बात है. कई बार बच्चों को समझाने या अनुशासन सिखाने के लिए डांटना भी जरूरी हो जाता है. इससे बच्चे सही-गलत का फर्क समझते हैं, अपनी भावनाओं को संभालना सीखते हैं और सीमाओं की अहमियत भी जान पाते हैं. लेकिन कई बार ऐसे पल बच्चों के मन पर गहरा असर छोड़ जाते हैं. डांट या बहस के बाद उनके मन में डर, शर्म, उलझन या अकेलेपन जैसी भावनाएं घर कर सकती हैं.

यही वजह है कि बच्चों को अनुशासन सिखाने जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी बाद में उनके साथ भरोसे का रिश्ता फिर से मजबूत करना भी है. बच्चों को यह महसूस होना चाहिए कि गुस्सा और बहस थोड़ी देर के लिए होते हैं, लेकिन रिश्तों में प्यार और अपनापन हमेशा बना रहता है. 

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बच्चों से बहस होने के बाद क्या जरूरी?

सबसे पहली बात है कि झगड़े या डांट के बाद बच्चों से दूरी न बनाएं. कई माता-पिता सोचते हैं कि कुछ देर चुप रहना बेहतर होगा, ताकि माहौल शांत हो जाए. लेकिन बच्चे इस चुप्पी को अक्सर अपने प्रति नाराजगी या अस्वीकार के रूप में महसूस करते हैं. ऐसे समय में उनके पास जाकर बैठना, सिर पर हाथ फेरना या सामान्य तरीके से बात करना उन्हें यह एहसास दिलाता है कि रिश्ता अभी भी सुरक्षित है.

मां- बाप को किस चीज का रखना चाहिए ध्यान?

इसके अलावा, बच्चों को लंबा-चौड़ा समझाने की बजाय उनकी भावनाओं को समझना ज्यादा जरूरी होता है. कई बार माता-पिता अपनी बात सही साबित करने में लग जाते हैं, लेकिन बच्चे उस समय तर्क नहीं बल्कि इमोशनल सहारा चाहते हैं. अगर माता-पिता शांत तरीके से यह जताएं कि उन्हें बच्चे की तकलीफ समझ आ रही है, तो बच्चे जल्दी सहज महसूस करते हैं.

इमोशनल बच्चों के लिए क्या रखें ध्यान?

बच्चों की भावनाओं को मान्यता देना भी बेहद जरूरी है. डांट खाने के बाद बच्चा अंदर से इमोशनल रूप से भरा हुआ महसूस करता है. ऐसे समय में उसे सलाह या भाषण नहीं, बल्कि यह भरोसा चाहिए कि उसकी भावनाएं गलत नहीं हैं. इसका मतलब यह नहीं कि बच्चे की गलती को सही ठहराया जाए, बल्कि यह समझाया जाए कि गुस्सा, दुख या डर महसूस करना सामान्य है.

बच्चों को डांटने के बाद क्या करें?

डांट के बाद माता-पिता की आवाज और भाषा भी बहुत मायने रखती है. शांत आवाज और नरम शब्द बच्चों को यह संकेत देते हैं कि अब स्थिति सामान्य हो रही है और वे सुरक्षित हैं. इससे बच्चे के मन में शर्म या डर कम होता है और वह अपनी गलती को बेहतर तरीके से समझ पाता है.

प्यार और बातचीत से बढ़ते हैं रिश्ते

हर बहस या अनुशासन के बाद बातचीत का अंत प्यार और अपनापन के साथ होना चाहिए. अगर रिश्ता तनाव या चुप्पी पर खत्म होता है, तो बच्चे उस बोझ को लंबे समय तक अपने भीतर रखते हैं. वहीं, एक मुस्कान, गले लगाना या प्यार से बात करना उन्हें यह भरोसा देता है कि माता-पिता का प्यार हमेशा उनके साथ है. असल में, बच्चों के साथ भरोसा इस बात से नहीं बनता कि कभी विवाद न हो, बल्कि इस बात से बनता है कि विवाद के बाद रिश्ते को कितने प्यार और समझदारी से संभाला जाए.

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