- गरीबी से लड़कर सविता प्रधान बनीं अफसर, मुश्किलों में रहकर की पढ़ाई.
- शादी के बाद ससुराल में सहा दुर्व्यवहार, खाती थीं छिपाकर रोटी.
- दो बेटों संग छोड़ा ससुराल, ब्यूटी पार्लर में काम कर गुजारा.
- बच्चों के लिए बेहतर जीवन की खातिर, फिर से शुरू की पढ़ाई.
मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव की बेटी ने वह कर दिखाया, जिसे सुनकर हर किसी की आंखे नम हो जाएं और दिल में उम्मीद जाग उठे. गरीबी, भूख, मारपीट और अपमान से भरी जिंदगी से निकलकर कठिन परीक्षा पास की और अफसर बन गई. यह कहानी है सविता प्रधान की एक ऐसी महिला, जिसने हालात से हार मानने के बजाय उनसे लड़ना चुना.
सविता का बचपन बहुत साधारण था. सरकारी स्कूल में पढ़ाई, पैसों की कमी और रोजमर्रा की दिक्कतें यही उनकी दुनिया थी. दसवीं में अच्छे अंक आए तो घरवालों को गर्व हुआ और उसे दूसरे कस्बे के स्कूल में दाखिला मिल गया. लेकिन वहां तक जाने के लिए बस अनियमित थी और 2 रुपये का किराया भी कई बार भारी पड़ता था. सविता कई दिनों तक पैदल चलकर स्कूल जाती रही. पढ़ने की लगन ने उसे थकने नहीं दिया.
शादी के बाद बदली जिंदगी की दिशा
कम उम्र में ही सविता की शादी एक संपन्न परिवार में कर दी गई. उसे भरोसा दिया गया कि वह आगे पढ़ सकेगी, पर यह वादा जल्द ही झूठ साबित हुआ. शादी के बाद उसका जीवन एक कैद की तरह हो गया. पति और ससुराल वालों का व्यवहार अमानवीय था. उसे भरपेट खाना तक नहीं दिया जाता था.
सविता बताती हैं कि कई बार वह रोटियां अपने कपड़ों में छिपाकर बाथरूम में जाकर खाती थीं, ताकि कोई देख न ले. छोटी-छोटी बातों पर मारपीट, दिन-रात काम और अपमान यह सब उसकी दिनचर्या बन चुका था.
दो बेटों का हाथ थामे, नई जिंदगी की ओर
पति का घर छोड़ते समय सविता के पास सामान बहुत कम था, लेकिन हिम्मत भरपूर थी. अपने दो छोटे बेटों का हाथ पकड़कर वह एक रिश्तेदार के घर पहुंचीं. रहने का ठिकाना तो मिल गया, पर आगे का रास्ता धुंधला था. गुजारे के लिए उन्होंने पास के एक ब्यूटी पार्लर में काम शुरू किया. दिनभर काम, शाम को बच्चों की देखभाल इसी बीच उनके मन में एक ही बात चलती रही “मुझे अपने बच्चों के लिए बेहतर जीवन बनाना है.”
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बच्चों की परवरिश के साथ फिर शुरू हुई पढ़ाई
इन्हीं कठिन दिनों में सविता ने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की. शादी के कारण जो पढ़ाई छूट गई थी, उसे पूरा करने का फैसला किया. घर और काम की जिम्मेदारी के बीच वह देर रात किताबें खोलकर बैठ जातीं. यही वह समय था जब उन्होंने मध्य प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन की तैयारी शुरू की. यह परीक्षा राज्य की सबसे कठिन परीक्षाओं में मानी जाती है. न कोचिंग, न मार्गदर्शन, न खाली समय फिर भी सविता ने हार नहीं मानी.
मेहनत रंग लाई
लगातार मेहनत के बाद सविता ने साल 2005 में यह परीक्षा दी और पास कर लीं. यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी. लेकिन उनका लक्ष्य इससे भी आगे था. उन्होंने दोबारा तैयारी की और 2006 में फिर से परीक्षा दी. इस बार उन्होंने पूरे राज्य में 83वीं रैंक हासिल की. इस सफलता ने उन्हें मध्य प्रदेश प्रशासनिक सेवा में जगह दिला दी.
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