होर्मुज संकट से भारत को मिला सबक, अनिल अग्रवाल बोले- ‘अब ऊर्जा में आत्मनिर्भर बनने का है सही वक्त’

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  • ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने के लिए आत्मनिर्भरता आवश्यक है।

US Iran War: हाल ही में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते तनाव ने एक बार फिर भारत की एक बड़ी कमजोरी को उजागर कर दिया है. भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल और आधे से ज्यादा गैस बाहर से मंगवाता है. ऐसे में जब भी दुनिया के किसी हिस्से में संघर्ष या तनाव होता है तो उसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल का मानना है कि यह स्थिति हमें एक बड़ा सबक देती है. भारत को अब ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से काम करना होगा.

संसाधनों की कमी नहीं, खोज की जरूरत

अनिल अग्रवाल के मुताबिक, भारत तेल और गैस के मामले में गरीब नहीं है. उनका कहना है कि देश में करीब 300 अरब बैरल तेल के बराबर संसाधन हो सकते हैं. समस्या यह नहीं है कि हमारे पास संसाधन नहीं है, बल्कि यह है कि हमने अभी तक उन्हें पूरी तरह खोजा और इस्तेमाल नहीं किया है. इन्वेस्टमेंट और आधुनित तकनीक की कमी इस क्षेत्र में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है. भारत की विदेशी तेल पर निर्भरता केवल एक सामान्य समस्या नहीं है, बल्कि यह एक स्ट्रक्चरल रिस्क है. इसका साफ मतलब यही है कि यह खतरा हमेशा बना रहेगा.

 वेदांता ने इस दिशा में बड़ा कदम उठाया

आज के टाइम में आधुनिक तकनीक जैसे AI, डिजिटल ऑयलफील्ड सिस्टम और एडवांस्ट सीस्मिक इमेजिंग के जरिए तेल की खोज और उत्पादन को तेज किया जा सकता है. अब वेदांता ने इस दिशा में बड़ा कदम उठाया है, जिसमें 5 अरब डॉलर इन्वेस्ट करने की योजना बनाई गई है और साथ ही आने वाले टाइम में उत्पादन को 10 लाख बैरल प्रतिदिन तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है. अनिल अग्रवाल का मानना है कि भारत में कई बार काम की गति सरकारी प्रक्रियाओं के कारण धीमी हो जाती है. उनका सुझाव है कि ज्यादा कागजी कार्रवाई में उलझने के बजाय काम को जल्दी शुरू करना चाहिए. इससे परियोजनाओं में तेजी आएगी और परिणाम जल्दी मिलेंगे.

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बहुत जरूरी- अनिल अग्रवाल

अनिल अग्रवाल का मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बहुत जरूरी है, खासकर अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों के साथ जो गहरे समुद्र में तेल निकालने की आधुनिक तकनीक और विशेषज्ञता रखती हैं. ये कंपनियां सिर्फ पैसा नहीं लातीं, बल्कि Gulf of Mexico और North Sea जैसे मुश्किल इलाकों में बड़े पैमाने पर काम करने का असली तजुर्बा भी साथ लाती हैं. यह साझेदारी भारत की सीखने की रफ्तार को तेज कर सकती है और देश के भीतर मौजूद तेल भंडार को जल्दी खोलने में मदद कर सकती है.

नीति सही है, अमल में कमी है 

भारत ने अपने तेल-गैस क्षेत्र में कई सुधार किए हैं. लाइसेंसिंग के नियम बेहतर हुए हैं और नियामक रवैया भी पहले से ज्यादा सहूलियत देने वाला हुआ है. लेकिन अनिल अग्रवाल कहते हैं कि नीति और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ा फासला अभी भी बना हुआ है. मंजूरियों में देरी और काम-काज में अड़चनें अब भी खोज के नतीजों को धीमा कर रही हैं.

बदलती सोच: खनन अब बाधा नहीं, बदलाव का रास्ता है 

अनिल अग्रवाल एक बड़े बदलाव की तरफ भी ध्यान दिलाते हैं. पहले खनन और तेल-गैस उत्पादन को पर्यावरण के लिए खतरा माना जाता था. लेकिन अब दुनिया की सोच बदल रही है. विकासशील देशों के लिए खनन और हाइड्रोकार्बन उत्पादन को ऊर्जा बदलाव (Energy Transition) का एक जरूरी हिस्सा माना जाने लगा है. होर्मुज संकट ने यह साफ कर दिया है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा सिर्फ बाहरी सप्लाई चेन पर नहीं टिक सकती. होर्मुज संकट से हमें यह सबक मिलता है कि भारत को ऊर्जा के लिए दूसरों पर निर्भर रहना बंद करना होगा और अपने देश के भीतर ही तेल और गैस निकालने के काम में तेजी लानी होगी.



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