International Dance Day 2026: तानों के तीरों से तराशी तकदीर, अब पूरी दुनिया को सुकून देती है आशीष के घुंघरुओं की झंकार

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कहते हैं कि अगर इरादे फौलादी हों तो समाज की रूढ़ियों की दीवारें रेत के महल की तरह ढह जाती हैं. धर्म और कला की नगरी काशी के एक युवा कलाकार ने इस बात को सच कर दिखाया. कभी उन्होंने समाज के ताने सुने, उपहास सहा, लेकिन अपने पैरों में बंधे घुंघरुओं की थाप को रुकने नहीं दिया. इन्हीं तानों के तीरों को उन्होंने अपनी तकदीर तराशने का जरिया बना लिया. आज उन्हीं घुंघरुओं की झंकार देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक सुनाई दे रही है. बता हो रही है काशी में रहने वाले आशीष की, जिनके घुंघरुओं की झंकार अब पूरी दुनिया को सुकून देती है. 

बचपन से ही नृत्य से था गहरा लगाव

बनारस के एक राजपूत परिवार में जन्मे आशीष घर के सबसे दुलारे थे. बचपन से ही उन्हें नृत्य से विशेष लगाव था. जैसे ही कहीं संगीत बजता, उनके भीतर थिरकने की चाह जाग उठती. हालांकि, परिवार को उनका यह शौक पसंद नहीं था. उनके दादा नृत्य को अच्छा नहीं मानते थे और कई बार उन्हें डांटने के साथ पिटाई भी कर देते थे. लगातार विरोध से आहत होकर आशीष कुछ समय के लिए वृंदावन भी चले गए, लेकिन नृत्य के प्रति उनका समर्पण कम नहीं हुआ.

मंदिर से शुरू हुआ रियाज का सफर

आशीष सिंह ने एबीपी से बातचीत में बताया कि बचपन में घर के पास स्थित मंदिर में होने वाले भजन-कीर्तन के दौरान वह नृत्य का अभ्यास करते थे. लोगों का सहयोग भले न मिला हो, लेकिन उन्होंने घंटों तक रियाज करना नहीं छोड़ा. साल 2007 से उन्होंने वाराणसी के बालाघाट स्थित व्यंकटेश बालाजी मंदिर में नियमित अभ्यास शुरू किया. यही वह स्थान था, जहां कभी शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खां भी रियाज करते थे.

पंडित बिरजू महाराज से सीखीं कथक की बारीकियां

आशीष ने पद्म विभूषण पंडित बिरजू महाराज से कथक की बारीकियां सीखीं. उनके मार्गदर्शन में आशीष ने अपनी कला को नया आयाम दिया. इसके बाद उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संगीत एवं मंच कला संकाय से वर्ष 2007 से 2012 के बीच कथक नृत्य में स्नातक और परास्नातक की डिग्री प्राप्त की.

‘नचनिया’ और ‘श्रीदेवी’ कहकर उड़ाया गया मजाक

आशीष का सफर आसान नहीं था. वह बताते हैं कि पुरुष होकर शास्त्रीय नृत्य को करियर बनाना आज भी कई जगहों पर अलग नजर से देखा जाता है. जब उन्होंने पहली बार घुंघरू बांधे तो अपनों ने भी सवाल उठाए. स्कूल में बच्चे उन्हें ‘नचनिया’ कहकर चिढ़ाते थे, जबकि मोहल्ले के लोग उन्हें ‘श्रीदेवी’ कहकर मजाक उड़ाते थे. कई बार परिवार के भीतर भी कठोर शब्द सुनने पड़े, लेकिन आशीष ने हार नहीं मानी और अपने सपने को जिंदा रखा.

काशी की मिट्टी से मिली कला की गहराई

आशीष की प्रस्तुति में बनारस घराने की शुद्धता और गहराई साफ दिखाई देती है. उन्होंने कठिन अभ्यास को अपनी ताकत बनाया. घंटों तक पैरों में भारी घुंघरू बांधकर ताल और लय पर पकड़ बनाने वाले आशीष का मानना है कि कला का कोई जेंडर नहीं होता, वह आत्मा की अभिव्यक्ति होती है.

विदेशों तक पहुंची घुंघरुओं की झंकार

आशीष की मेहनत रंग लाई और उन्हें बड़े-बड़े मंचों से निमंत्रण मिलने लगे. उनकी भाव-भंगिमा, चपलता और तत्कार ने आलोचकों को भी प्रशंसा करने पर मजबूर कर दिया. उन्होंने भारत के कई प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुति दी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय संस्कृति का परचम लहराया.वर्ष 2015 में उन्होंने चीन में आयोजित ‘द सेकंड सिल्क रोड इंटरनेशनल आर्ट फेस्टिवल’ में एक दर्जन से अधिक प्रस्तुतियां दीं. इससे पहले वर्ष 2010 में पंडित बिरजू महाराज के निर्देशन में उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स के उद्घाटन समारोह में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया. आशीष की प्रतिभा को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2010 से 2012 के बीच उन्हें राष्ट्रीय छात्रवृत्ति से सम्मानित किया. 

आज युवाओं के लिए प्रेरणा हैं आशीष

कभी जिन कदमों का मजाक उड़ाया गया था, आज वही कदम कई युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं. आशीष की कहानी यह साबित करती है कि अगर हौसला मजबूत हो तो समाज के ताने भी एक दिन तालियों में बदल जाते हैं.

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