न हिंदुस्तानी, न अंग्रेज; जानिए कौन थे RBI के पहले गवर्नर और कितना रहा उनका कार्यकाल

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आज जब भारतीय रिजर्व बैंक देश की अर्थव्यवस्था की धड़कन माना जाता है, तब बहुत कम लोग जानते हैं कि इसके पहले गवर्नर एक ऑस्ट्रेलियाई बैंकर थे. उनका नाम था सर ऑसबोर्न आर्केल स्मिथ. उन्होंने ऐसे समय में यह जिम्मेदारी संभाली, जब भारत में बैंकिंग व्यवस्था नई राह पर कदम रख रही थी.

सर स्मिथ का जन्म 26 दिसंबर 1876 को ऑस्ट्रेलिया में हुआ. वे शुरू से ही बैंकिंग के पेशे से जुड़े रहे. करीब 20 साल तक उन्होंने बैंक ऑफ न्यू साउथ वेल्स में काम किया. इसके बाद 10 साल तक कॉमनवेल्थ बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया में सेवाएं दीं. बैंकिंग के क्षेत्र में उनकी समझ, अनुशासन और साफ सोच ने उन्हें अलग पहचान दिलाई.

कब आए भारत?

साल 1926 में वे भारत आए. यहां उन्हें इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का मैनेजिंग गवर्नर बनाया गया. उस समय इंपीरियल बैंक देश की सबसे बड़ी बैंकिंग संस्था मानी जाती थी. भारत की आर्थिक हालत, व्यापार की जरूरतें और बैंकिंग की चुनौतियां अलग थीं, लेकिन स्मिथ ने जल्दी ही इस माहौल को समझ लिया. उनके नेतृत्व में इंपीरियल बैंक की कार्यशैली में सुधार हुआ और बैंकिंग व्यवस्था को नई मजबूती मिली.

उनके काम की सराहना केवल भारत में ही नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन में भी हुई. मार्च 1929 में उन्हें ‘नाइट’ की उपाधि दी गई. 27 फरवरी 1930 को नई दिल्ली के वायसराय हाउस में उस समय के गवर्नर जनरल लॉर्ड इरविन ने उन्हें औपचारिक रूप से यह सम्मान दिया. आगे चलकर उन्हें KCIE और फिर KCSI जैसे बड़े सम्मान भी मिले. ये सम्मान उस दौर में बहुत प्रतिष्ठित माने जाते थे.

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कब हुई RBI की शुरुआत

इसी बीच भारत में एक नए केंद्रीय बैंक की जरूरत महसूस की जा रही थी. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना की तैयारी चल रही थी. जब 1 अप्रैल 1935 को आरबीआई की शुरुआत हुई, तो सर ऑसबोर्न स्मिथ को इसका पहला गवर्नर नियुक्त किया गया. यह जिम्मेदारी आसान नहीं थी. देश में अलग-अलग प्रांत, अलग-अलग आर्थिक हालात और कई चुनौतियां थीं. एक नए केंद्रीय बैंक को खड़ा करना अपने आप में बड़ी बात थी.

कब दिया इस्तीफा

स्मिथ ने अपने अनुभव के आधार पर कई अहम फैसले लिए. वे ब्याज दर और विनिमय दर जैसे मुद्दों पर अपनी साफ राय रखते थे. उनका मानना था कि बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए कुछ नीतियां जरूरी हैं. हालांकि, इन मुद्दों पर उनकी सोच उस समय की सरकार से अलग थी. यही मतभेद आगे चलकर उनके पद छोड़ने का कारण बने. उन्होंने 30 जून 1937 को अपना पद छोड़ दिया, यानी कार्यकाल पूरा होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया. लेकिन इतने कम समय में भी उन्होंने आरबीआई की बुनियाद को मजबूत किया.

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