Explained: अब जब क्रूड ऑयल सस्ता हुआ, तो पेट्रोल, डीजल, LPG और CNG क्यों नहीं? क्यो कंज्यूमर्स को नहीं मिल रहा हक

1d78134b92c7b098646768be68f4aa2617829000798381317 original


यह सवाल हर भारतीय के मन में आता है जब इंटरनेशनल मार्केट में कच्चा तेल सस्ता हो जाता है, तो हमारे यहां पेट्रोल, डीजल, LPG और CNG के दाम क्यों नहीं घटते? 28 जून 2026 तक ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल से गिरकर 80 डॉलर से नीचे आ गया था. करीब 30% की गिरावट के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम जस के तस बने हुए हैं. इसके पीछे का पूरा गणित समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि कच्चे तेल से ये चारों चीजें बनने में क्या-क्या खर्च आता है और कंज्यूमर तक पहुंचते-पहुंचते इनकी कीमत कैसे कई गुना बढ़ जाती है…

1. पेट्रोल: कैसे 37 रुपए का तेल 100 रुपए से ज्यादा में बिकता

पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के मुताबिक, पेट्रोल की कीमत को समझने के लिए हमें इसके हर पड़ाव पर नजर डालनी होगी:

  • भारत अपनी करीब 90% जरूरत का कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. यह तेल डॉलर में खरीदा जाता है. अगर क्रूड की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल है और एक बैरल में 159 लीटर तेल होता है, तो एक लीटर कच्चे तेल की कीमत करीब 50 रुपए बनती है (जब डॉलर की कीमत 83 रुपए हो).
  • यहां एक और बात समझनी जरूरी है कि एक बैरल कच्चे तेल से सिर्फ पेट्रोल नहीं बनता. एक बैरल से करीब 72-78 लीटर पेट्रोल, 38-46 लीटर डीजल, 8-10 लीटर LPG और कुछ अन्य चीजें बनती हैं. इस वजह से पेट्रोल की कीमत सीधे 159 से डिवाइड करके नहीं निकाली जा सकती.
  • कच्चे तेल को पेट्रोल में बदलने में करीब 3-5 डॉलर प्रति बैरल (करीब 250-400 रुपए) खर्च आता है. यानी करीब 3 रुपए प्रति लीटर. इसमें रिफाइनरी की ऊर्जा खपत, मजदूरी और रखरखाव शामिल है.
  • IOC, BPCL और HPCL तेल कंपनियों का मार्जिन करीब 8-11 रुपए प्रति लीटर होता है. डीलर (पंप वाले) को करीब 4 रुपए प्रति लीटर कमीशन मिलता है. रिफाइनर को भी करीब 4-6 रुपए प्रति लीटर का फायदा होता है. यानी कुल मिलाकर करीब 16-21 रुपए प्रति लीटर.
  • टैक्स से असली कहानी शुरू होती है. केंद्र सरकार करीब 20 रुपए प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी लगाती है. इसके अलावा राज्य सरकारें करीब 25-30 रुपए प्रति लीटर वैट (VAT) लगाती हैं. दिल्ली में कुल टैक्स करीब 28.9 रुपए प्रति लीटर है, जबकि महाराष्ट्र में यह और भी ज्यादा है.
  • जून 2026 में दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपए प्रति लीटर बिक रहा था. यानी कच्चे तेल की कीमत तो करीब 50 रुपए थी, लेकिन टैक्स और दूसरे खर्चों ने इसे 100 रुपए के पार पहुंचा दिया. कुल कीमत का लगभग 40-55% हिस्सा सिर्फ टैक्स होता है.

2. डीजल: पेट्रोल से थोड़ा सस्ता क्यों?

पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के मुताबिक, डीजल की कीमत का गणित भी पेट्रोल जैसा ही है, बस थोड़ा-सा फर्क है:

  • एक बैरल क्रूड से करीब 38-46 लीटर डीजल बनता है. डीजल पर भी रिफाइनिंग का खर्च लगभग उतना ही आता है यानी करीब 3 रुपए प्रति लीटर.
  • डीजल पर केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी करीब 16-17 रुपए प्रति लीटर होती है, जो पेट्रोल से थोड़ा कम है.
  • राज्यों का वैट भी पेट्रोल से कम होता है, क्योंकि डीजल को ‘जरूरी’ ईंधन माना जाता है. इससे ट्रक, बस और कृषि मशीनें चलती हैं.
  • जून 2026 में दिल्ली में डीजल 95.20 रुपए प्रति लीटर बिक रहा था. मुंबई में यह 97.83 रुपए था.

3. LPG: जिस पर सब्सिडी का खेल

LPG यानी रसोई गैस की कीमत का गणित पेट्रोल-डीजल से थोड़ा अलग है. इन्वेस्टिंग डॉट कॉम की रिपोर्ट के मुताबिक, एक बैरल क्रूड से करीब 8-10 लीटर LPG बनती है. LPG को शुद्ध करने में भी खर्च आता है, लेकिन इसकी कीमत इंटरनेशनल मार्केट में LPG की कीमत से तय होती है, सीधे क्रूड से नहीं. LPG की कीमतें:  

  • इंटरनेशनल LPG प्राइस- जो क्रूड की कीमत से तय होता है.
  • समुद्री भाड़ा और बीमा- जहाज से LPG को भारत लाने का खर्च.
  • रिफाइनिंग और फिलिंग खर्च- सिलेंडर में भरने तक का खर्च शामिल है.
  • कंपनी का मार्जिन- IOC, BPCL, HPCL का फायदा निकाला जाता है.
  • डीलर कमीशन- गैस एजेंसी वालों का मुनाफा भी होता है.
  • टैक्स- केंद्र और राज्य सरकार पेट्रोल की तरह टैक्स लगाती हैं.

सब्सिडी का बड़ा रोल: LPG पर सरकार सब्सिडी देती है. आम 14.2 किलो के सिलेंडर पर सब्सिडी करीब 420-465 रुपए के बीच होती है. 7 जून 2026 को LPG के दाम 29 रुपए प्रति सिलेंडर बढ़ाए गए. उज्ज्वला योजना के तहत सब्सिडी वाला सिलेंडर 642 रुपए का मिलता है.

इसके बावजूद LPG सस्ता नहीं हो रहा, क्योंकि इसकी कीमत सीधे क्रूड से नहीं जुड़ी है. यह LPG के इंटरनेशनल मार्केट प्राइस से तय होती है, जो क्रूड से अलग चलता है. इसके अलावा सरकार LPG पर टैक्स कम रखती है, लेकिन वह सब्सिडी कम करके बढ़ी हुई लागत को कंज्यूमर पर डाल सकती है.

4. CNG: जो पेट्रोल से आधी कीमत पर मिलता है

कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG) को पेट्रोल-डीजल का ‘सस्ता ऑप्शन’ माना जाता है. CNG प्राकृतिक गैस से बनती है, कच्चे तेल से नहीं. प्राकृतिक गैस को दबाकर CNG बनाई जाती है. इसकी कीमत में है:  

  • नेचुरल गैस की कीमत- जो अंतरराष्ट्रीय बाजार और सरकारी कंट्रोल दोनों से तय होती है.
  • संपीड़न (compression)- गैस को दबाकर CNG बनाने का खर्च.
  • पाइपलाइन और ट्रांसपोर्ट- गैस को पंप तक पहुंचाने का खर्च.
  • कंपनी का मार्जिन- इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (IGL) और अन्य कंपनियों का फायदा.
  • टैक्स- केंद्र और राज्य के टैक्स (लेकिन पेट्रोल-डीजल से बहुत कम).

CNG पर डायरेक्ट टैक्स कम है. सरकार की नजर में यह ‘पर्यावरण अनुकूल’ ईंधन है. लेकिन CNG की कीमत नेचुरल गैस की कीमत पर निर्भर करती है, जो क्रूड से अलग है. फिर भी दिल्ली में CNG पेट्रोल से करीब 20 रुपए प्रति किलो सस्ती है. दिल्ली में CNG के दाम 83.09 रुपए प्रति किग्रा. हैं, तो वहीं बेंग्लुरू में 111.68 रुपए प्रति किग्रा. है.

क्रूड सस्ता होने के बावजूद कीमतें क्यों नहीं घट रहीं?  

ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, क्रूड ऑयल सस्ता न होने की 5 बड़ी वजहें हैं:

  1. महंगा स्टॉक अभी खत्म नहीं हुआ: तेल कंपनियां एक दिन में तेल नहीं खरीदतीं. अप्रैल-मई 2026 में जब क्रूड 100-120 डॉलर प्रति बैरल था, तब कंपनियों ने बड़ी मात्रा में महंगा तेल खरीद लिया था. केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा था, ‘कंपनियां अभी भी महंगे दामों पर खरीदे गए कच्चे तेल को प्रोसेस कर रही हैं.’ सस्ता तेल रिफाइनरी तक पहुंचने में 30-45 दिन लग जाते हैं.
  2. 15 दिन का औसत फॉर्मूला: तेल कंपनियां खुदरा कीमतें तय करते समय पिछले 15 दिन या एक महीने की औसत आयात लागत को आधार बनाती हैं. अगर तेल अचानक 30% सस्ता हुआ है, तो इसका असर औसत में धीरे-धीरे आएगा, फौरन नहीं.
  3. सरकार को टैक्स से होने वाली कमाई: पेट्रोल-डीजल पर सरकार को भारी टैक्स मिलता है. वित्त वर्ष 2023-24 में पेट्रोलियम सेक्टर से सरकार को करीब 7.5 लाख करोड़ रुपए की कमाई हुई. अगर सरकार टैक्स कम करती है, तो उसे इस कमाई में कटौती करनी पड़ेगी.
  4. रुपया कमजोर होना: कच्चा तेल डॉलर में खरीदा जाता है. अगर रुपया कमजोर हो जाए, तो डॉलर की कीमत बढ़ जाती है और आयात महंगा हो जाता है. जून 2026 में रुपया 94-95 के आसपास था. अगर 1 डॉलर 95 रुपए के बराबर है, तो 80 डॉलर प्रति बैरल का तेल 7,600 रुपए प्रति बैरल पड़ता है.
  5. जियो-पॉलिटिकल जोखिम: पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से तेल की कीमतें घटी हैं. लेकिन होर्मुज स्ट्रेट में शिपिंग ट्रैफिक और सप्लाई में देरी जैसी समस्याएं अभी भी बरकरार हैं. कंपनियां डरती हैं कि कल फिर से कीमतें बढ़ सकती हैं, इसलिए वे जल्दबाजी में कीमतें नहीं घटातीं.

तो कंज्यूमर को कब राहत मिलेगी?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, राहत इन बातों पर निर्भर करती है:

  • अगर क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास स्थिर रहता है और रुपया भी मजबूत बना रहता है, तो 30-45 दिनों में कीमतों में कुछ कमी आ सकती है. वो भी जब महंगा स्टॉक खत्म हो जाएगा.
  • अगर सरकार एक्साइज ड्यूटी में कटौती नहीं करती, तो राहत बहुत कम होगी.
  • बिना टैक्स कटौती के कीमतों में 5-7 रुपए प्रति लीटर से ज्यादा की गिरावट की उम्मीद नहीं है.
  • LPG और CNG की कीमतें क्रूड से अलग चीजों पर निर्भर करती हैं, इसलिए उनमें तुरंत बदलाव नहीं आएगा.

फिलहाल, कंज्यूमर्स को सब्र रखना होगा और कंपनियों के अगले कुछ हफ्तों के फैसलों पर नजर रखनी होगी.



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *