Food Preservation: जब नहीं था फ्रिज तो गर्मी में खाना ताजा कैसे रखते थे बुजुर्ग, जान लें देसी तरीका

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Food Preservation Without Fridge : आज के समय में अगर घर में फ्रिज खराब हो जाए तो सबसे बड़ी चिंता यही होती है कि दूध, सब्जियां और बचा हुआ खाना कैसे बचेगा. हर रसोई में फ्रिज अब जरूरत बन चुका है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे दादा-दादी और नाना-नानी के जमाने में जब बिजली भी हर घर में नहीं थी और फ्रिज जैसी चीजें मौजूद नहीं थी, तब लोग गर्मियों में खाना ताजा कैसे रखते थे. दरअसल पुराने समय के लोग प्रकृति और मौसम को समझकर ऐसे देसी तरीके अपनाते थे. जिनसे बिना बिजली के भी खाना लंबे समय तक सुरक्षित रहता था. आज भी भारत और दुनिया के कई गांवों और पहाड़ी इलाकों में ये पारंपरिक तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं. खास बात यह है कि ये तरीके सस्ते, आसान और पर्यावरण के लिए भी अच्छे माने जाते हैं. तो आइए जानते हैं कि जब फ्रिज नहीं था तो बुजुर्ग गर्मी में खाना ताजा कैसे रखते थे. 

1. मिट्टी का घड़ा –  पुराने समय में मिट्टी के घड़े और मटके का इस्तेमाल सिर्फ पानी ठंडा रखने के लिए नहीं, बल्कि खाने को सुरक्षित रखने के लिए भी किया जाता था. मिट्टी में प्राकृतिक ठंडक होती है. जब घड़े की बाहरी सतह से पानी धीरे-धीरे सूखता है तो अंदर का तापमान कम हो जाता है, गांवों में लोग दूध, दही, छाछ और पका हुआ चावल तक मिट्टी के बर्तनों में रखते थे. कई जगह इन बर्तनों को गीले कपड़े से ढक दिया जाता था जिससे अंदर ज्यादा देर तक ठंडक बनी रहे.

2. जीर पॉट – अफ्रीका और मध्य पूर्व के इलाकों में एक खास तकनीक काफी मशहूर रही है, जिसे जीर पॉट कहा जाता है. इसे प्राकृतिक फ्रिज भी माना जाता है. इसमें एक बड़े मिट्टी के बर्तन के अंदर छोटा बर्तन रखा जाता है और दोनों के बीच गीली रेत भर दी जाती है. ऊपर से गीला कपड़ा ढक दिया जाता है. जब पानी सूखता है तो अंदर ठंडक पैदा होती है. इससे फल, सब्जियां और दूध एक-दो दिन तक ताजा रह सकते हैं. भारत के कई सूखे और गर्म इलाकों में भी इसी तरह के तरीके अपनाए जाते रहे हैं.

3. बहते पानी का यूज – पहाड़ी राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में लोग प्राकृतिक झरनों और बहते पानी का इस्तेमाल करते थे. खाने के बर्तन या टोकरी को बहते पानी के पास या ऊपर लटका दिया जाता था. पानी की ठंडक खाने को जल्दी खराब होने से बचाती थी. साथ ही लगातार हवा मिलने से नमी कम रहती थी और बैक्टीरिया भी कम पनपते थे.आज भी कई दूरदराज के पहाड़ी गांवों में यह तरीका देखने को मिल जाता है.

4. नमक और धूप – फ्रिज आने से पहले सबसे ज्यादा यूज नमक और धूप का होता था. लोग मछली, मांस और सब्जियों को नमक लगाकर धूप में सुखा देते थे.धूप से खाने की नमी निकल जाती थी और नमक बैक्टीरिया को बढ़ने से रोकता था. इससे खाना लंबे समय तक खराब नहीं होता था. भारत के कई राज्यों में आज भी आम का अचार, सूखी मछली, पापड़ और बड़ी इसी तकनीक से बनाए जाते हैं. कच्चे आम के टुकड़ों को नमक लगाकर सुखाया जाए तो कई महीनों तक चल जाते हैं.

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5. जमीन के अंदर भंडारण – कश्मीर, नेपाल और ठंडे इलाकों में लोग जमीन के अंदर गड्ढे बनाकर सब्जियां और अनाज रखते थे. जमीन के नीचे तापमान सामान्य रहता है, इसलिए आलू, प्याज, गाजर जैसी चीजें लंबे समय तक सुरक्षित रहती थीं.कुछ गांवों में आज भी लोग घर के आंगन में छोटे भंडारण गड्ढे बनाते हैं.

6. राख और भूसी – महाराष्ट्र, ओडिशा और कई ग्रामीण इलाकों में लोग अदरक, हल्दी, लहसुन और शकरकंद जैसी चीजों को सूखी राख या भूसी में दबाकर रखते थे.राख नमी सोख लेती थी और कीड़ों को दूर रखती थी. इससे सब्जियां जल्दी खराब नहीं होती थीं और लंबे समय तक ताजा बनी रहती थीं.

7. फर्मेंटेशन – पहाड़ी इलाकों में लोग सब्जियों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए फर्मेंटेशन का सहारा लेते थे. इसमें सब्जियों को नमक और मसालों के साथ बंद करके रखा जाता था. कुछ दिनों बाद उनमें प्राकृतिक फर्मेंटेशन शुरू हो जाता था. इससे भोजन लंबे समय तक सुरक्षित रहता था और उसका भी टेस्ट बढ़ जाता था.हिमालयी क्षेत्रों में बनने वाले कई पारंपरिक खाद्य पदार्थ आज भी इसी तकनीक से तैयार किए जाते हैं.

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