अगर आपसे पूछा जाए कि मुंबई में 20 लाख रुपये सालाना कमाने वाला और जयपुर में 8 लाख रुपये सालाना कमाने वाला, इनमें से कौन ज्यादा पैसे बचाता होगा, तो ज्यादातर लोग पहला विकल्प चुनेंगे. लेकिन एक बिजनेस एक्सपर्ट की गणना कुछ और ही कहानी बताती है. उनके मुताबिक, सैलरी जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है उस शहर में रहने का खर्च. कई बार कम कमाई वाला व्यक्ति भी ज्यादा बचत कर लेता है, अगर उसका खर्च कम हो.
मुंबई का हिसाब-किताब
बिजनेस एक्सपर्ट ने ऐसा दावा किया है कि मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है और यहां सैलरी पैकेज भी आमतौर पर ज्यादा होते हैं. लेकिन इसके साथ रहने का खर्च भी काफी ऊंचा है. एक बेडरूम फ्लैट का किराया कई इलाकों में 45 हजार रुपये महीने तक पहुंच जाता है. इसके अलावा खाने-पीने, ट्रांसपोर्ट, पार्किंग और दूसरी रोजमर्रा की जरूरतों पर भी अच्छा-खासा पैसा खर्च होता है. यानी बड़ी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा शुरुआत में ही खर्चों में निकल जाता है.
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जयपुर के क्या हैं हालात
दूसरी तरफ जयपुर जैसे टियर-2 शहर में रहने की लागत काफी कम है. यहां एक बेडरूम फ्लैट करीब 18 हजार रुपये महीने में मिल सकता है. खाने-पीने, यात्रा और अन्य घरेलू खर्च भी महानगरों की तुलना में कम होते हैं. ऐसे में भले ही सैलरी कम हो, लेकिन महीने के अंत में बचत के लिए ज्यादा पैसा बच जाता है.
रोज के खर्चे में अंतर
बिजनेस एक्सपर्ट के अनुसार, अगर जयपुर में किसी चीज पर 100 रुपये खर्च होते हैं तो मुंबई में उसी चीज के लिए करीब 148 रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं. यह अंतर सिर्फ एक-दो सामान तक सीमित नहीं है. किराना, बाहर खाना, कैब, बिजली बिल और दूसरी कई सेवाएं मुंबई में महंगी पड़ती हैं. यही वजह है कि दोनों शहरों की कमाई की तुलना सिर्फ सैलरी के आधार पर नहीं की जा सकती.
मुंबई में रहने वाले लोगों की एक बड़ी शिकायत ट्रैफिक को लेकर रहती है. कई कर्मचारी रोजाना दो घंटे या उससे ज्यादा समय सड़क पर बिताते हैं. वहीं जयपुर में ज्यादातर लोग 15 से 20 मिनट में अपने ऑफिस या जरूरी जगहों तक पहुंच जाते हैं. इससे न सिर्फ समय बचता है, बल्कि पेट्रोल और यात्रा पर होने वाला खर्च भी कम होता है.
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आखिर कौन करता है ज्यादा बचत?
बिजनेस एक्सपर्ट के मुताबिक, जब किराया, रोजमर्रा का खर्च, यात्रा और जीवनशैली से जुड़े दूसरे खर्चों को जोड़कर देखा जाता है तो जयपुर में रहने वाला व्यक्ति सालाना करीब 3 लाख रुपये ज्यादा बचा सकता है. यानी 8 लाख रुपये कमाने वाला व्यक्ति भी कई मामलों में 20 लाख रुपये कमाने वाले से बेहतर स्थिति में हो सकता है.