संकट में भारत की ‘रूसी तेल लाइफलाइन’, क्या फिर महंगा होगा पेट्रोल-डीजल, अमेरिका ने अब क्या किया?

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Russion Oil: रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने वाले भारत के लिए आने वाले दिनों में एक नई मुसीबत आ खड़ी हो सकती है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अपने हालिया बयान में कहा कि अमेरिका इन छूटों को जल्द से जल्द समाप्त करना चाहता है. यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद से अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद की बार-बार टिप्पणी की है. यह दावा करते हुए कि कच्चे तेल के निर्यात से होने वाली आय मॉस्को के सैन्य अभियान को आर्थिक सहायता प्रदान करने में मदद करती है.

मंगलवार को सीनेट की विदेश संबंध बैठक हुई. इस दौरान इन टिप्पणियों ने नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव के एक मुद्दे को फिर से हवा दे दी है. यूक्रेन जंग शुरू होने के बाद से अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद की बार-बार आलोचना की है, यह दावा करते हुए कि कच्चे तेल के निर्यात से होने वाली आय मॉस्को के सैन्य अभियान को आर्थिक पुष्टी करने में मदद करती है. हालांकि, ट्रंप ने तब अस्थायी छूट भी दी थी जब अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध की वजह से वैश्विक ऊर्जा बाजारों को प्रस्ताव के दबाव का सामना करना पड़ा था. बता दें, पहली बार छूट मार्च में दी गई थी और बाद में दो बार बढ़ाई गई, 17 जून को समाप्त होने वाली है. 

भारत के मजबूत रुख अपनाने की संभावना 

अब मामले में भारत की ओर से मजबूत रुख अपनाने की आशंका है. ऐसे में कई एक्पर्टों ने साफ किया है कि भारत की ओर से रूसी तेल के आयात ने रूसी कच्चे तेल की उपलब्धता सुनिश्चित करके, भले ही वह रियायती दरों पर बेचा गया हो, ऊर्जा संकट को और गंभीर होने से रोकने में मदद की. यह मुद्दा केवल तेल तक ही सीमित नहीं है. 

नई दिल्ली ने लगातार यह कहा है कि ऊर्जा खरीद राष्ट्रीय हित, संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा से प्रेरित होती है. सरकार ने बार-बार देश की जरूरतों को पूरा करने वाले किसी भी व्यापारी से तेल खरीदने के अपने अधिकार का बचाव किया है.

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भारत के लिए इसका क्या है मतलब ? 

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से भारतीय वस्तुओं पर 25 प्रतिशत तक शुल्क लगाया है. जिसके बाद भारत की ओर से रूसी तेल की खरीद पर दबाव बढ़ गया है. ट्रंप ने नई दिल्ली पर यूक्रेन में रूस के युद्ध प्रयासों को आर्थिक सहायता करने में मदद का आरोप लगाया था.  वाशिंगटन ने बार-बार मामले में अपना पक्ष रखा है. वाशिंगटन ने  कहा रूसी कच्चे तेल के निर्यात से प्राप्त राजस्व मॉस्को को अपने सैन्य अभियानों को जारी रखने के लिए आर्थिक सहायता देता था. 

ट्रंप ने कई मौकों पर यह दावा भी किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भरोसा दिया था कि भारत धीरे-धीरे रूसी तेल की खरीद बंद कर देगा. हालांकि नई दिल्ली ने खुलेआम ऐसी किसी वफादारी की पुष्टि नहीं की है, लेकिन यह मुद्दा बाद में दोनों देशों के बीच व्यापक व्यापार बातचीत के दौरान सामने आया.

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अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के बाद व्हाइट हाउस के मुताबिक,  ट्रंप ने 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ वापस लेने पर सहमति जताई, जब भारत ने रूसी संघ के तेल की खरीद बंद करने की वफादारी जताई. दस्तावेज़ में कहा गया है कि टैरिफ में कमी भारत की ओर से रूसी कच्चे तेल के आगे या पीछे आयात को रोकने की शपथ से जुड़ी थी. साथ ही पाबंदीयों को लेकर चिंता के पीछे एक बड़ा भू-राजनीतिक लक्ष्य है. वाशिंगटन भारत और अन्य प्रमुख आयातकों पर रूसी कच्चे तेल पर अपने भरोसे को धीरे-धीरे कम करने और अन्य स्रोतों, विशेष रूप से वेनेजुएला से आपूर्ति प्राप्त करने के लिए दबाव डाल रहा है.

 



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