India-China Border Trade: 6 साल बाद भारत-चीन ट्रेड को मिली हरी झंडी, 1 अगस्त से सस्ते मिलेंगे तिब्बती ऊन और पश्मीना

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India-China Border Trade News: उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में लिपुलेख दर्रे के रास्ते होने वाले भारत-चीन पारंपरिक सीमा व्यापार को लेकर लंबे इंतजार के बाद स्थिति साफ हो गई है. भारतीय व्यापारियों का पहला दल 1 अगस्त 2026 को चीन के तिब्बत क्षेत्र में स्थित तकलाकोट मंडी में प्रवेश करेगा. चीन की ओर से कार्यक्रम को मंजूरी मिलने के बाद सीमांत क्षेत्र के व्यापारियों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं.

कोरोना महामारी के कारण वर्ष 2020 से बंद सीमा व्यापार छह साल बाद दोबारा शुरू होने जा रहा है. लिपुलेख दर्रे के रास्ते होने वाला यह परंपरागत कारोबार पिथौरागढ़ के सीमांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.

तकलाकोट में निर्माण के कारण टलता रहा कारोबार

भारत-चीन सीमा व्यापार की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर दी गई थी, लेकिन चीन की तरफ तकलाकोट में नई व्यापार मंडी और गोदाम का निर्माण पूरा नहीं होने के कारण भारतीय व्यापारियों को इंतजार करना पड़ा. व्यापार सत्र औपचारिक रूप से जून में शुरू हो गया था, लेकिन वास्तविक कारोबार शुरू नहीं हो सका. चीन के अधिकारियों ने बाजार की तैयारियां पूरी होने तक व्यापारियों को रुकने के लिए कहा था. 

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अब एक अगस्त से भारतीय व्यापारियों के तकलाकोट पहुंचने का रास्ता साफ हो गया है. व्यापारी लिपुलेख दर्रे को पार कर तिब्बत में प्रवेश करेंगे. इसके बाद तकलाकोट मंडी में भारतीय और तिब्बती व्यापारियों के बीच सामान की खरीद-बिक्री शुरू होगी.

गुंजी में खोला गया कस्टम कार्यालय

सीमा व्यापार को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए भारतीय प्रशासन ने गुंजी में सीमा शुल्क कार्यालय स्थापित किया है. व्यापारियों को ट्रेड पास जारी करने के साथ उनके सामान की जांच और दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी की जा रही है.

इससे पहले पहले दल के लिए 26 ट्रेड पास जारी किए गए थे, जिनमें 17 व्यापारी और नौ सहायक शामिल थे. प्रशासन को सौ से अधिक व्यापारियों के आवेदन मिले थे और दूसरे दल के लिए भी पास जारी करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी. व्यापारियों ने अपना सामान लिपुलेख के निकट स्थित सीमावर्ती गांवों और गोदामों तक पहले ही पहुंचा दिया है. सामान को आगे ले जाने के लिए घोड़े और खच्चरों की व्यवस्था भी की गई है.

सड़क बनने से आसान हुई सामान की ढुलाई

धारचूला से लिपुलेख तक सड़क बनने के बाद इस बार कारोबार का स्वरूप पहले की तुलना में बदला हुआ दिखाई देगा. पहले भारतीय व्यापारियों को अधिकांश सामान घोड़ों और खच्चरों की मदद से दुर्गम रास्तों से सीमा तक पहुंचाना पड़ता था. अब वाहनों के माध्यम से सामान को लिपुलेख के काफी करीब तक पहुंचाया जा सकता है. हालांकि अंतिम हिस्से में सामान ढोने के लिए पारंपरिक साधनों की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है.

सीमांत गांवों में रोजगार और कारोबार की उम्मीद

भारत-चीन सीमा व्यापार के दोबारा शुरू होने से धारचूला, गुंजी, नाभी, कुटी और आसपास के सीमांत गांवों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ने की उम्मीद है. व्यापार से केवल पंजीकृत व्यापारियों को ही लाभ नहीं मिलता, बल्कि सामान ढोने वाले मजदूरों, घोड़ा-खच्चर संचालकों, वाहन चालकों और स्थानीय दुकानदारों के लिए भी रोजगार के अवसर पैदा होते हैं.

भारत से व्यापारी आम तौर पर कपड़े, खाद्य सामग्री, मसाले और दैनिक उपयोग की वस्तुएं लेकर तकलाकोट जाते हैं. वापसी में तिब्बती क्षेत्र से ऊन, पश्मीना और अन्य पारंपरिक उत्पाद लाए जाते रहे हैं. भारत-चीन सीमा व्यापार वर्ष 1991 में दोबारा शुरू हुआ था, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण वर्ष 2020 में इसे स्थगित कर दिया गया. अब छह साल बाद कारोबार बहाल होने से सीमांत व्यापारियों में उत्साह है.

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