Prateek Yadav Last Rites: अर्पणा के पिता ने दी प्रतीक को मुखाग्नि, क्या ससुर को है दामाद के अंतिम संस्कार का अधिकार

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Prateek Yadav Last Rites: भारतीय जनता पार्टी की नेता अपर्णा यादव के पति प्रतीक यादव का निधन हो गया. आज 14 मई को लखनऊ के भैंसाकुंड में प्रतीक का अंतिम संस्कार किया गया. अर्पणा के पिता अरविंद सिंह बिष्ट ने नम आंखों से अपने दामाद को मुखाग्नि दी.

प्रतीक यादव के पंचतत्व में विलीन होने के बाद अब चारों ओर यही चर्चा है कि, क्या ससुर अपने दामाद का अंतिम संस्कार कर सकता है? क्या शास्त्रों में ससुर को अपने दामाम के अंतिम संस्कार का अधिकार है? आइए सनातन धर्म के 18 महापुराणों में एक गरुण पुराण के अनुसार जानते हैं कि, मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार या मुखाग्नि का अधिकार आखिर किसे होता है?

बता दें कि, प्रतीक यादव समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे थे, जिनकी शादी बीजेपी नेता अर्पणा यादव से हुई. महज 38 साल की आयु में प्रतीक यादव का निधन हो गया. प्रतीक की दो बेटियां हैं. आमतौर पर पिता के अंतिम संस्कार या मुखाग्नि का अधिकार बेटे को होता है. लेकिन प्रतीक की दो बेटियां हैं. इस दुख की घड़ी में समस्या यह थी कि, मुखाग्नि की परंपरा कौन निभाएगा.

हालांकि आजकल समाज में सोच बदल रहे हैं, जिसमें बेटियों को भी मुखाग्नि देने का अधिकार है और इसे नैतिक माना जाता है. लेकिन हिंदू धर्म में किसी की मृत्यु के बाद मुखाग्नि या अंतिम संस्कार की परंपरा को लेकर कई तरह की धारणाएं, मान्यताएं और नियम होते हैं. गरुड़ पुराण और शास्त्रों में इस संबंध में कई बातें बताई गई हैं.

पुत्र न हो तो कौन दे सकता है मुखाग्नि

गरुड़ पुराण के अनुसार, अंतिम संस्कार या मुखाग्नि को लेकर बताए गए नियम के अनुसार, मुखाग्नि का पहला अधिकार मृतक के पुत्र को है. लेकिन परिवार में पुत्र न हो तो पोता, भाई, भतीजा या फिर पत्नी भी यह नियम कर सकती है. कई बार बेटियां भी मुखाग्नि की जिम्मेदारी निभा सकती हैं.

हिंदू धर्म और शास्त्रों के अनुसार, ससुर अपने दामाद को मुखाग्नि नहीं दे सकता. धार्मिक मान्यताओं में दामाद (जमाई) को यमराज का रूप माना गया है. अंतिम संस्कार का पहला अधिकार पुत्र, पौत्र, या परिवार के अन्य रक्त संबंधी (सपिंड) का होता है. वहीं ससुर और दामाद का गोत्र भी अलग होता है. हालांकि, ससुर द्वारा दामाद का अंतिम संस्कार किए जाने पर स्पष्ट निषेध भी नहीं है. यदि परिवार में कोई निकट पुरुष सदस्य मौजूद न हो या परिस्थितियां विशेष हों, तो ससुर भी यह जिम्मेदारी निभा सकते हैं. हिंदू परंपरा में भावना, कर्तव्य और परिवार की सहमति को भी मान्यता दी गई है.

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