- छात्रों का रुझान अब रोजगार-उन्मुख कोर्सों की तरफ है.
संस्कृत को भारत की सबसे पुरानी और समृद्ध भाषा में गिना जाता है. इसी भाषा से हमारे दर्शन, साहित्य ज्ञान और इतिहास का बड़ा हिस्सा लिखा गया है. ऐसे में जब खबर आती है कि पाकिस्तान के लाहौर में छात्र संस्कृत सीखने में के लिए दिलचस्पी ले रहे हैं . वहीं, भारतीय छात्र अपने ही पारंपरिक कोर्सों से दूर होते जा रहे हैं तो ऐसे में एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है कि आखिर छात्र अपनी ही विरासत से क्यों दूर हो रहे हैं…
यह सिर्फ एक भाषा की बात नहीं है, बल्कि उस सोच की भी बात है. जिसमें हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को किस नजर से देखते हैं. जिस भाषा को कभी ज्ञान और परंपरा का आधार माना गया, आज उसे नए समय के साथ जोड़ने में चुनौती का समाना करना पड़ रहा है.
पाकिस्तान में कई दशक बाद संस्कृत फिर से हायर एजुकेशन का हिस्सा बनती जा रही है. लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज में संस्कृत के दो कोर्स पहले ही पढ़ाई जा चुके हैं इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए अब इसे नियमित कोर्स में जोड़ने की तैयारी की जा रही है. रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान में संस्कृत को किसी धार्मिक भाषा यह इतिहास के लिए नहीं बल्कि संस्कृति और पुराने साहित्य को समझना कई छात्र दक्षिण एशिया की साझा विरासत को जानने के लिए इस भाषा की तरफ अपनी रुचि दिखा रही है.
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में डॉ.शाहिद रशीद संस्कृत पढ़ा रहे हैं. उनके अनुसार लाहौर संस्कृत सीखने का बहुत बड़ा केंद्र रहा है. वहां कई ऐसी जगह थीं जहां से पूरे हिंदुस्तान में संस्कृत की किताबें जाती थीं. संस्कृत दक्षिण एशिया की साझा विरासत है.
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जामिया को नहीं मिल रहे छात्र
वहीं, भारत में के जाम दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया में 2026-27 सत्र के लिए संस्कृत फारसी जैसे कोर्सों के लिए छात्रों की संख्या पूरी नहीं हुई. जिसकी वजह से जामिया विश्वविद्यालय ने 5 कोर्सों को बंद करने का फैसला लिया. जामिया ने बीए संस्कृत और एमए संस्कृत जैसे कोर्स को को जारी रखने का फैसला किया है. जबकि इसमें भी दाखिले की उम्मीद है कम है. विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि आने वाले वर्षों में छात्रों की संख्या बढ़ सकती है, इसलिए इन कोर्स को अभी जारी रखा जाएगा.
एक्सपर्ट्स की मानें तो अब छात्र जिन कोर्स को करके जल्द ही नौकरी लग जाए ऐसे कोर्स की तरफ बढ़ रहे हैं. AI के जमाने में छात्रों की पसंद बदल रही है. ऐसे में पारंपरिक विषयों को कई बार कम रोजगार वाले क्षेत्र के रूप में देखा जाता है. जिस वजह से इन विषयों में दाखिले प्रभावित हो रहे हैं.
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