Shingles Vaccine Lowers Heart Disease Risk: दाद से बचाने वाली वैक्सीन को लेकर एक नई स्टडी में चौंकाने वाली बात सामने आई है. रिसर्चर के मुताबिक, शिंगल्स की दो अलग-अलग वैक्सीन की तुलना करने पर नई वैक्सीन लेने वाले लोगों में दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा कम पाया गया. इस ग्रुप में दिल की बीमारी, हार्ट फेल्योर और दिल की धड़कन के अनियमित होने जैसी समस्याएं कम देखी गईं. पुरुषों में इस वैक्सीन के बाद इस्केमिक स्ट्रोक का खतरा भी करीब 12 प्रतिशत कम पाया गया.
यह स्टडी मशहूर मेडिकल जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुई है. शोधकर्ताओं ने अमेरिका के लोगों के बड़े स्वास्थ्य रिकॉर्ड का डेटा खंगाला. इसमें 60 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोगों को शामिल किया गया था. रिसर्चर ने उन लोगों की तुलना की, जिन्हें पहले वाली शिंगल्स वैक्सीन लगी थी और उन लोगों की, जिन्हें बाद में इस्तेमाल में आई नई वैक्सीन दी गई थी.
सात साल तक लोगों पर रखी गई नजर
इस स्टडी के लिए अमेरिका के करीब 60 हेल्थ सेंटर से डेटा लिया गया. इस नेटवर्क में 10 करोड़ से ज्यादा लोगों के हेल्थ रिकॉर्ड मौजूद थे. मुख्य स्टडी में 36,460-36,460 लोगों के दो ग्रुप बनाए गए. दोनों ग्रुप के लोगों की उम्र, बीमारियों, दवाओं और हेल्थ से जुड़ी दूसरी चीजों को ध्यान में रखकर उनकी तुलना की गई. इसके बाद करीब सात साल तक देखा गया कि उनमें दिल से जुड़ी बीमारियां कितनी सामने आईं. स्टडी के लिए वह समय चुना गया, जब अमेरिका में पुरानी शिंगल्स वैक्सीन की जगह नई वैक्सीन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा था. पहले दौर में करीब 98.6 प्रतिशत लोगों को पुरानी वैक्सीन लगी थी. वहीं, एक साल बाद वाले दौर में करीब 93.5 प्रतिशत लोगों को नई वैक्सीन दी गई.
रिसर्चर ने पाया कि नई वैक्सीन वाले ग्रुप में सात साल के दौरान दिल और नसों से जुड़ी बीमारियों का कुल खतरा करीब 9 प्रतिशत कम था. हालांकि, समय के साथ यह अंतर धीरे-धीरे कम होता गया.

हार्ट फेल्योर और दिल की बीमारी में भी कमी
स्टडी में दिल की नसों से जुड़ी बीमारी के मामलों में करीब 10 प्रतिशत की कमी देखी गई. वहीं, हार्ट फेल्योर का खतरा करीब 12 प्रतिशत कम पाया गया. पुरुषों और महिलाओं दोनों में इसके नतीजे लगभग एक जैसे रहे. इसके अलावा, दिल की धड़कन के अनियमित होने की बीमारी यानी एट्रियल फिब्रिलेशन का खतरा भी नई वैक्सीन वाले ग्रुप में करीब 7 प्रतिशत कम पाया गया. हालांकि, हर तरह की दिल और नसों से जुड़ी बीमारी में कमी नहीं मिली. दिल की मांसपेशियों में सूजन, पैरों की नसों की बीमारी, दिमाग में खून बहने और कुछ समय के लिए स्ट्रोक जैसे मामलों में कोई खास अंतर नहीं मिला.

स्ट्रोक को लेकर क्या सामने आया?
इस्केमिक स्ट्रोक के मामलों में दोनों ग्रुप के बीच कुल मिलाकर कोई बड़ा अंतर नहीं मिला. लेकिन जब पुरुषों और महिलाओं के आंकड़ों को अलग-अलग देखा गया, तो पुरुषों में इस्केमिक स्ट्रोक का खतरा करीब 12 प्रतिशत कम पाया गया. इसका मतलब यह नहीं है कि शिंगल्स वैक्सीन सभी लोगों में स्ट्रोक का खतरा 12 प्रतिशत कम कर देती है. स्टडी में सिर्फ एक संभावित संबंध सामने आया है. इसे पक्का साबित करने के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत है.
शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि कहीं दूसरे कारणों की वजह से तो नतीजे प्रभावित नहीं हुए. इसके लिए उन्होंने कोरोना महामारी के दौर को हटाकर भी डेटा की जांच की. इसके अलावा मौत के आंकड़ों को शामिल करके भी दोबारा एनालिसिस किया गया. इन सभी जांचों के बाद भी मुख्य नतीजों में ज्यादा बदलाव नहीं आया.
वैक्सीन का असर कैसे हो सकता है?
शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे शरीर की इम्यूनिटी और नसों की अंदरूनी परत में होने वाले बदलाव की भूमिका हो सकती है. नई शिंगल्स वैक्सीन में इस्तेमाल होने वाला एक खास घटक शरीर की इम्यूनिटी को लंबे समय तक सक्रिय रख सकता है. इससे शरीर में सूजन पैदा करने वाली कुछ प्रक्रियाएं कम हो सकती हैं. शरीर में ज्यादा सूजन को दिल की बीमारियों के खतरे से जोड़ा जाता है. इसलिए माना जा रहा है कि वैक्सीन और दिल की बेहतर सेहत के बीच कोई संबंध हो सकता है.
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हालांकि, शरीर में होने वाले ये बदलाव हमेशा बने रहें, यह जरूरी नहीं है. यही वजह हो सकती है कि स्टडी के शुरुआती सालों में दिल की बीमारियों में कमी ज्यादा दिखाई दी, लेकिन बाद के सालों में इसका असर कम होता गया.
अभी शिंगल्स वैक्सीन को हार्ट अटैक की दवा न समझें
स्टडी के नतीजे दिल की सेहत को लेकर उम्मीद जरूर जगाते हैं, लेकिन शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि इससे यह साबित नहीं होता कि शिंगल्स वैक्सीन सीधे तौर पर हार्ट अटैक या स्ट्रोक को रोकती है. यह एक ऐसी स्टडी है जिसमें पहले से मौजूद हेल्थ रिकॉर्ड के आधार पर लोगों की तुलना की गई है. इसमें कुछ ऐसे फैक्टर की पूरी जानकारी नहीं थी, जो दिल की बीमारी के खतरे को प्रभावित कर सकते हैं. इनमें धूम्रपान, खान-पान, शराब, पढ़ाई, नौकरी और कमाई जैसी चीजें शामिल हैं. इसलिए यह पूरी तरह नहीं कहा जा सकता कि नतीजे सिर्फ वैक्सीन की वजह से ही आए.
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