आप सुबह उठे, चाय-नाश्ता किया, दोपहर में दाल-रोटी और रात को फिर से खाना खा लिया. तीन वक्त का खाना आज की जिंदगी का इतना हिस्सा बन गया है कि हमें लगता है, ‘यही तो सही तरीका है.’ लेकिन क्या सच में ऐसा है? खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के CEO राजित पुन्हानी ने कहा, ‘भारतीय परंपरा में तीन नहीं, बल्कि दो बार भोजन करने की सलाह दी गई थी.’ तो क्या वाकई वेदों और पुराणों में दो वक्त के खाने की बात कही गई है. अगर हां, तो फिर हम तीन बार खाने के आदी कैसे हो गए…
FSSAI CEO राजित पुन्हानी ने क्या कहा?
2 सितंबर 2026 को FSSAI CEO राजित पुन्हानी ने मीडिया से इंटरव्यू में कहा, ‘भारतीय परंपरा में तीन निश्चित भोजन यानी ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर का चलन नहीं था. दो भोजन अधिक पारंपरिक पैटर्न था.’
पुन्हानी ने यह भी कहा कि आज के जमाने में पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड इतना आम हो गया है कि लोग सुबह के नाश्ते को भी बाजार से खरीदे गए पैकेटों पर निर्भर करते हैं. FSSAI की ‘ईट राइट थाली’ मुहिम इसी बात पर जोर देती है कि हमें अपनी पारंपरिक, घर में बनी, स्थानीय चीजों पर वापस लौटना चाहिए.
FSSAI ने 2025 में 424 पेज की एक किताब भी जारी की. इसमें 29 राज्यों की पारंपरिक थालियों को दिखाया गया. किताब में कहा गया कि पारंपरिक भारतीय खाना ज्यादातर पौधों पर आधारित था यानी अनाज, दालें, मसाले, मौसमी सब्जियां, फल और दूध से बनी चीजें.
अब सवाल यह है कि क्या यह बात सिर्फ FSSAI CEO का अपना विचार है, या इसके पीछे कोई ठोस सबूत है…
वेदों और पुराणों में क्या लिखा है?
वेदों-पुराणों में भोजन पर लिखी बातों को 4 पॉइंट्स में समझते हैं…
1. वेदों में सीधा उल्लेख
तैत्तिरीय ब्राह्मण (1.4.9) में साफ-साफ लिखा है, ‘मनुष्य को दिन में सिर्फ दो बार भोजन करना चाहिए.’
ऋग्वेद संहिता (4.30.3) में भी भोजन करते समय बैठने की मुद्रा का जिक्र है, जो दिखाता है कि उस वक्त भोजन को एक गंभीर अनुष्ठान की तरह लिया जाता था. एक प्राचीन आयुर्वेदिक कहावत या लोक-उक्ति के मुताबिक, ‘जो दिन में एक बार भोजन करता है वह योगी है, जो दो बार करता है वह भोगी है और जो तीन बार करता है वह रोगी है.’
2. धर्मशास्त्रों और गृह्यसूत्रों में नियम
गौतम धर्मसूत्र (IX.59), बौधायन धर्मसूत्र (II.7.36), मनुस्मृति (II.56) और संवर्त स्मृति (12) में एक ही बात कही गई है, ‘एक गृहस्थ को रोजाना सिर्फ दो भोजन करने चाहिए और बीच में कुछ नहीं खाना चाहिए. जो ऐसा करता है, वह उपवास का पुण्य फल पाता है.’
गोभिल स्मृति (II.33) भी यही कहती है और यह भी बताती है कि रात का भोजन रात होने के साढ़े चार घंटे (1.5 प्रहर) तक किया जा सकता है.
खादिर-गृह्यसूत्र (I.2.23) में भी लिखा है, ‘दिन में दो भोजन होते हैं.’ आपस्तम्ब धर्मसूत्र (II.8.19.10) में थोड़ी छूट दी गई है. दो मुख्य भोजनों के बीच जड़ें और फल खाए जा सकते हैं.
3. महाभारत में भीष्म पितामह की सलाह
महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामह कहते हैं, ‘देवताओं ने मनुष्यों के लिए दो समय निर्धारित किए हैं- सुबह और शाम. इसके बीच में कुछ नहीं खाना चाहिए.’
4. सुश्रुत संहिता (आयुर्वेद) में समय का नियम
आयुर्वेद के जनक आचार्य सुश्रुत ने भी दिन में दो बार भोजन की इजाजत दी है. एक बार सुबह और एक बार शाम (रात) को. सुश्रुत संहिता के मुताबिक, जो लोग दो बार भोजन करने के आदी हैं, उन्हें सुबह साढ़े तीन प्रहर (करीब 8:30 बजे) पर हल्का आधा भोजन करना चाहिए. दूसरा, तीसरे और चौथे प्रहर के बीच (दोपहर 3 से शाम 5:30 के बीच) करना चाहिए.
हालांकि, एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि ये नियम सबके लिए एक जैसे नहीं थे. जिन्होंने वैदिक अग्निहोत्र (अग्नि की पूजा) की दीक्षा ली थी, उनके लिए यह नियम नहीं था. वे दिन में कई बार भोजन कर सकते थे.
भारतीय परंपरा में दो बार खाने के पीछे का साइंस क्या है?
भारतीय परंपरा में सिर्फ भोजन कितनी बार नहीं, बल्कि कब खाना चाहिए भी लिखा है…
- पाचन को समय: आयुर्वेद और योग दोनों में इस बात पर जोर दिया जाता है कि भोजन को पूरी तरह पचने में समय लगता है. वैदिक दिनचर्या के मुताबिक, भोजन को पचने में 8 से 11 घंटे लगते हैं. अगर आप हर 3-4 घंटे में कुछ खाते रहेंगे, तो पाचन कभी पूरा नहीं हो पाता.
- अंतराल का महत्व: प्राचीन योगिक पद्धति के मुताबिक, दो मुख्य भोजनों के बीच कम से कम 6 से 8 घंटे का गैप होना चाहिए. सद्गुरु भी यही सलाह देते हैं, ‘अगर आपकी उम्र 35 से ज्यादा है, तो दो बार का भोजन आपके लिए ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक होगा. हालांकि, जब तक कि आप बहुत एक्टिव न हों या कोई मेडिकल समस्या न हो.’
- ऋतु और शरीर: आयुर्वेद में सिर्फ ‘कितनी बार’ नहीं, बल्कि ‘कब’ खाना है, इस पर भी बहुत जोर है. सुश्रुत ने कहा, ‘भोजन दिन के दो छोर पर करना चाहिए. एक बार सुबह और एक बार शाम (रात को).’
तो फिर तीन बार खाने का चलन कहां से आया?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक,
- ब्रिटिश और पश्चिमी प्रभाव: भारत पर ब्रिटिश राज के दौरान पश्चिमी खान-पान की आदतों का असर बढ़ा. ब्रिटिश लोग तीन वक्त का खाना (नाश्ता, दोपहर का भोजन, रात का भोजन) लाते थे. धीरे-धीरे यह भारतीय मध्यम वर्ग में भी फैल गया.
- औद्योगीकरण और 9 से 5 नौकरी: जैसे-जैसे लोग कारखानों और दफ्तरों में काम करने लगे, वैसे-वैसे तय समय पर खाना (लंच ब्रेक) एक जरूरत बन गया. दो वक्त का खाना खेतों या घर के कामों के हिसाब से था. घड़ी के हिसाब से चलने वाली नौकरियों में फिट नहीं बैठता था.
- पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री का मार्केटिंग हथकंडा: आज ब्रेकफास्ट सीरियल, एनर्जी बार और पैकेटबंद स्नैक्स कंपनियां ‘नाश्ता सबसे जरूरी भोजन है’ का नारा देकर अपना माल बेचती हैं. FSSAI CEO ने भी इसी तरफ इशारा किया कि पैकेज्ड फूड को ‘सुविधाजनक नाश्ता’ के रूप में बेचा जाता है.
मॉडर्न साइंस क्या कहता है?
पिछले कुछ सालों में इंटरमिटेंट फास्टिंग यानी कुछ घंटे खाना, बाकी समय उपवास का दुनिया भर में चलन शुरू हुआ है. दिलचस्प बात यह है कि यही तो हमारी प्राचीन परंपरा है. सुबह-शाम दो बार खाना और बीच में कुछ नहीं.
FSSAI की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रोसेस्ड फूड की बढ़ती खपत और बार-बार खाने की आदत के कारण मोटापा, डायबिटीज और दिल की बीमारियां बढ़ रही हैं. FSSAI का कहना है कि पारंपरिक भारतीय आहार पुरानी बीमारियों के जोखिम को कम कर सकता है.
सद्गुरु कहते हैं, ‘जब आप दिन में सिर्फ दो बड़े भोजन करते हैं और बीच में कुछ नहीं खाते (जैसा कि हम आश्रम में करते हैं), तो आपकी बड़ी आंत हमेशा साफ रहती है.’
तो क्या दो बार खाना हर किसी के लिए सही है?
नहीं. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यहां एक बड़ी बात समझनी जरूरी है:
- हर किसी का शरीर अलग होता है.
- काम के तरीके मायने रखते हैं, यानी मेहनत-मजदूरी करने वाले को ज्यादा एनर्जी चाहिए.
- उम्र, बीमारी, गर्भावस्था और स्तनपान जैसी स्थितियों में ज्यादा पोषण की जरूरत होती है.
- आयुर्वेद भी कहता है कि यह आपके शरीर के प्रकार और पाचन क्षमता पर निर्भर करता है.