सोशल मीडिया पर इन दिनों लिंफैटिक वॉकिंग का ट्रेंड तेजी से पॉपुलर हो रहा है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि रोजाना सिर्फ 10 मिनट की खास तरीके से की गई वॉक शरीर की सूजन और ब्लोटिंग को कम कर सकती है. सामान्य वॉक से अलग, इसमें पॉश्चर, सांस लेने के तरीके और चलने की स्पीड पर खास ध्यान दिया जाता है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह वाकई उतनी असरदार है जितना दावा किया जा रहा है, या यह सिर्फ एक और फिटनेस ट्रेंड भर है. आइए समझते हैं कि लिंफैटिक सिस्टम कैसे काम करता है और यह वॉकिंग तकनीक इसमें कितनी मदद कर सकती है.
क्या होता है लिंफैटिक सिस्टम?
शरीर में खून की तरह ही लिंफ नाम का एक तरल पदार्थ भी बहता है, जो शरीर से अतिरिक्त फ्लूइड और वेस्ट मटीरियल को बाहर निकालने का काम करता है. खून को पंप करने के लिए दिल होता है, लेकिन लिंफ सिस्टम का अपना कोई पंप नहीं होता. यह सिस्टम मुख्य रूप से मांसपेशियों के सिकुड़ने औऱ सांस लेने की प्रक्रिया से ही आगे बढ़ता है. यही वजह है कि जब शरीर ज्यादा देर तक एक ही पोजीशन में बैठा रहता है, तो फ्लूइड टिश्यू में जमा होने लगता है, जिससे सूजन और भारीपन महसूस होता है.
चलने से कैसे मिलता है फायदा?
जब कोई व्यक्ति चलता है, तो पैरों और शरीर की मांसपेशियां लगातार सिकुड़ती है और फैलती हैं, जिसमें लिंफ फ्लूइड को आगे बढ़ने में मदद मिलती है. रिसर्च में यह भी सामने आया है कि हल्की एक्सरसाइज के दौरान लिंफ का आराम की स्थिति के मुकाबले कई गुना तक बढ़ जाता है. इसी वजह से जो लोग लंबे समय तक बैठे रहते हैं, उनके लिए बीच-बीच में उठकर थोड़ी देर चलना पैरों की सूजन कम करने में मददगार साबित होता है.
10 मिनट की वॉक में क्या है खास?
लिंफैटिक वॉकिंग में सामान्य वॉक के मुकाबले पॉश्चर सीधा रखने, गहरी और नियमित सांस लेने और हाथों को स्वाभाविक तरीके से हिलाने पर जोर दिया जाता है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे शरीर की मांसपेशियों का मूवमेंट बेहतर होता है, जो लिंफ फ्लूइड को आगे बढ़ाने में मदद करता है . हालांकि इस बात के कोई खास वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं कि सिर्फ पॉश्चर या सांस के तरीके में बदलाव करने से लिंफ फ्लो सामान्य वॉक के मुकाबले काफी ज्यादा बढ़ जाता है, क्योंकि मांसपेशियों का सिकुड़ना और सांस लेना, यह प्रक्रिया हर तरह की वॉक में एक जैसी ही होती है.
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हल्का महसूस होना फ्लूइड का बदलाव, फैट लॉस नहीं
एक्सपर्ट्स साफ कहते है कि वॉक के बाद जो हल्कापन महसूस होता है, वह ज्यादातर मामलों में शरीर में जमा एक्स्ट्रा फ्लूइड के हटने की वजह से होता है, न कि फैट कम होने की वजह से. यानी यह एक अस्थायी बदलाव है, कोई वेट लॉस नहीं. खासतौर पर लंबे समय तक बैठे रहने, हार्मोनल बदलाव या ज्यादा नमक खाने से होने वाली हल्की सूजन और ब्लोटिंग में वॉक करने से राहत मिल सकती है.
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