
इसी समस्या को दूर करने के लिए राज्य सरकार ने इन किताबों का हिंदी में अनुवाद कराने का फैसला किया है. यह पहल भोपाल स्थित राज्य के इकलौते गवर्नमेंट यूनानी मेडिकल कॉलेज के लिए की जा रही है, जहां हाल के सालों में उन छात्रों कि संख्या लगातार बढ़ी है जिनको उर्दू भाषा नहीं आता है.

इसको लोगू करने के पिछे का सबसे बढ़ा कारण है भोपाल के इस कॉलेज में हर साल गैर-उर्दू भाषी छात्रों की तादाद बढ़ती जा रही थी, और उन्हें उर्दू में लिखी किताबों से पढ़ाई करने में मुश्किल आती है. सत्र 2025-26 में कुल 75 सीटों में से 15 सीटों पर ऐसे छात्रों ने दाखिला लिया जिन्हें उर्दू नहीं आती. यानी साफ है कि हर साल गैर-उर्दू भाषी छात्रों की संख्या बढ़ रही है, और यही वजह है कि अब सरकार को हिंदी किताबें लाने की जरूरत महसूस हुई.

इस बढ़ोतरी की एक बड़ी वजह केंद्र सरकार के दाखिला नियमों में हुआ एक बदलाव भी है. सत्र 2022-23 के बाद से नियमों में बदलाव करते हुए यह तय किया गया कि यूनानी मेडिकल कोर्स में दाखिले के लिए दसवीं कक्षा में उर्दू पढ़ना अब अनिवार्य नहीं रहेगा. पहले यह शर्त अनिवार्य थी, जिसकी वजह से बहुत से छात्र चाहकर भी इस कोर्स में दाखिला नहीं ले पाते थे.

आयुष विभाग के अधिकारियों के मुताबिक इस फैसले से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग यानी SC, ST और OBC छात्रों की भागीदारी भी बढ़ने की उम्मीद है. विभाग का कहना है कि राज्य में यूनानी डॉक्टरों के कई पद अभी भी खाली पड़े हैं, क्योंकि इन वर्गों से योग्य उम्मीदवार अक्सर उपलब्ध नहीं हो पाते. खास बात यह है कि जो नए गैर-उर्दू भाषी छात्र इस कोर्स में दाखिला ले रहे हैं, उनमें ज्यादातर इन्हीं समुदायों से आते हैं. ऐसे में हिंदी किताबें आने से इन छात्रों की पढ़ाई आसान होगी, जिससे आगे चलकर खाली पड़े डॉक्टरों के पद भरने में भी मदद मिल सकती है.

अभी तक की स्थिति यह थी कि यूनानी मेडिसिन जैसा पारंपरिक कोर्स सिर्फ उर्दू जानने वाले छात्रों तक ही सीमित माना जाता था. इससे बहुत से मेधावी छात्र सिर्फ भाषा की वजह से इस फील्ड से दूर रह जाते थे. अब हिंदी किताबें आने के बाद यह बाधा हट जाएगी और यूनानी चिकित्सा शिक्षा हर वर्ग और भाषा के छात्रों के लिए खुल जाएगी.
Published at : 30 Jul 2026 10:13 AM (IST)