Xप्लेन: 80% मांसाहार भारतीयों के भारत का ‘असली खाना’ क्या? BRICS डिनर से बवाल

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नई दिल्ली में 12 सितंबर 2026 को BRICS समिट के गाला डिनर में शाकाहारी मेन्यू परोसा गया. इसमें खांडवी, पनीर लबाबदार, गुच्छी मरमिक, मिलेट पुलाव, खुंब गलौटी और जलेबी जैसे व्यंजन थे. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने X पर पोस्ट करते हुए लिखा, ‘रिकॉर्ड के लिए, 80% भारतीय नॉनवेज खाते हैं. भारतीय नॉनवेज खाना बहुत स्वादिष्ट होता है.’ राहुल ने प्रियंका गांधी वाड्रा के बनाए छोले-भटूरे की तस्वीर भी शेयर की. इस पर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने पलटवार करते हुए कहा कि मेहमानों ने भारतीय शाकाहारी व्यंजनों का मजा लिया. इस बहस को पश्चिम बंगाल में बागेश्वर बाबा धीरेंद्र शास्त्री के दुर्गा पूजा के दौरान नॉनवेज पर रोक लगाने के बयान ने और भड़का दिया. आखिर भारत का असली खाना है क्या…

भारत का खाना सिर्फ शाकाहारी नहीं, वह कभी था भी नहीं

अगर इतिहास में झांकें तो पता चलता है कि भारत में मांस खाने की परंपरा हजारों साल पुरानी है.

हिस्टोरिसिटी रिसर्च जनरल की रिपोर्ट ‘द इवेल्युशन ऑफ नॉन-वेजिटेरियनिज्म एंड वेजिटेरियनिज्म ऑफ इंडिया इन द पास्ट’ में लिखा है कि सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में गाय, भेड़, कछुआ, मछली और मुर्गे की हड्डियां मिली हैं, जो साफ बताती हैं कि उस दौर के लोग मांस खाते थे. यही नहीं, वैदिक काल के आर्यों के बारे में कई इतिहासकारों का मानना है कि वे गोमांस भी खाते थे.

मार्क्सवादी इतिहासकार आर.एस. शर्मा ने 1977 में अपनी किताब ‘India’s Ancient Past’ में लिखा कि ‘पशुपालन की वजह से वैदिक काल में गोमांस खाना प्रचलित था.’

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिलिस (UCLA) ने भारत में शाकाहारी भोजन पर रिसर्च स्टडी की. इसके मुताबिक, शाकाहार का असली उदय बौद्ध और जैन धर्म के आने के बाद हुआ. छठी शताब्दी ईसा पूर्व में महावीर और बुद्ध ने अहिंसा पर जोर दिया, जिससे शाकाहार को बढ़ावा मिला. UCLA ने रिपोर्ट में दावा किया कि बुद्ध खुद शाकाहारी नहीं थे, कहा जाता है कि उनका आखिरी भोजन सूअर का मांस था. यानी शाकाहार भारत में शुरू से नहीं था, बल्कि एक ऐतिहासिक प्रक्रिया के तहत आया.

इस पर भारत के फूड क्रिटिक और हिस्टोरियन पुष्पेश पंत का कहना है कि ऐसी कहानियां हैं कि गौतम बुद्ध कमंडल में से खाना खाते थे. जो व्यक्ति कमंडल में जिस भी तरह का खाना खाता था, गौतम बुद्ध खा लेते थे. इस वजह से मांस खाने वाली बात प्रचलित हुई.

इस्लामिक शासन यानी मुगलों के दौरान कबाब, बिरयानी, कोरमा और निहारी जैसे नॉनवेज व्यंजन भारतीय रसोई का हिस्सा बने. मुगलों ने पर्शियन और तुर्किये तकनीकों को भारतीय मसालों के साथ मिलाकर मुगलई खाना बनाया. हालांकि, यह समझना गलत होगा कि मुगलों से पहले भारत में नॉनवेज नहीं था.

वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी ने लिखा है, ‘हिंदू समुदायों में नॉनवेज परंपरा हमारे शुरुआती दर्ज इतिहास तक जाती है.’ मौर्य साम्राज्य (321-185 ईसा पूर्व) के समय भी भारतीय सांप, खरगोश और मेंढक खाते थे.

 

लंदन स्थित ब्रिटिश लाइब्रेरी में पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के ग्रंथ निमतनामा में 15वीं शताब्दी में आलू-मांस के समोसे बनाते पुर्तगाली.
लंदन स्थित ब्रिटिश लाइब्रेरी में पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के ग्रंथ निमतनामा में 15वीं शताब्दी में आलू-मांस के समोसे बनाते पुर्तगाली.

तो फिर राहुल गांधी का 80% वाला दावा कितना सही?

राहुल गांधी का 80% का आंकड़ा पूरी तरह सटीक नहीं है, लेकिन इसके करीब जरूर है.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5, 2019-2021) के मुताबिक, 15-49 साल के 87% पुरुष और 75% महिलाएं मीट, मछली या अंडा खाती हैं. औसतन यह आंकड़ा करीब 80% बैठता है. 2006 में यह 74% था, जो 2021 में बढ़कर 80% हो गया.

राज्यों की बात करें तो तस्वीर बहुत साफ है. नागालैंड में 99.8% लोग मांस खाते हैं, जबकि राजस्थान में सबसे ज्यादा 71.17% लोग शाकाहारी हैं. सिर्फ तीन राज्यों पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में शाकाहारी लोग बहुमत में हैं. केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे तटीय राज्यों में 95% से ज्यादा लोग मांस खाते हैं.

द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, धार्मिक आंकड़ों की बात करें तो मुस्लिम (99%), ईसाई (99%) और बौद्ध (97%) आबादी लगभग पूरी मांस खाती है. हिंदुओं में भी तीन-चौथाई से ज्यादा लोग मांस खाते हैं. सबसे ज्यादा शाकाहारी जैन हैं. इनमें सिर्फ एक-चौथाई लोग कभी मांस खा चुके हैं. यानी धार्मिक पहचान और खाने की आदत का सीधा रिश्ता है, लेकिन यह रिश्ता उतना सरल नहीं जितना लगता है.

शाकाहार की ‘ऊंची जगह’ कैसे बनी?

द स्टेट्समैन की रिपोर्ट के मुताबिक, इसका जवाब जाति व्यवस्था में छिपा है. भीमराव आंबेडकर और गेल ओमवेट जैसे विद्वानों ने तर्क दिया है कि ब्राह्मणवादी विचारधारा ने खाने की आदतों को सामाजिक नियंत्रण के औजार के तौर पर इस्तेमाल किया. शाकाहार को शुद्धता, आध्यात्मिकता और ऊंचे सामाजिक दर्जे से जोड़ा गया, जबकि नॉनवेज को अपवित्र और नीच माना गया. सांस्कृतिक सिद्धांतकार अर्जुन अप्पडुराई ने इसे ‘गैस्ट्रो-पॉलिटिक्स’ कहा, यानी खाना ताकत और पहचान का जरिया बन जाता है.

इसी वजह से आज भी एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स, दफ्तरों और रिहायशी सोसाइटियों में शाकाहारी और नॉनवेज के लिए अलग बैठने की जगह होती है. किराए के मकानों में अक्सर शाकाहारी होने की शर्त रखी जाती है, जिसे कुछ विद्वान ‘फूड-बेस्ड अपार्थीड’ कहते हैं. त्योहारों के दौरान मीट की बिक्री पर रोक भी लगाई जाती है, जिसे धार्मिक भावनाओं का सम्मान बताया जाता है. यह बहुसंख्यकवाद का एक रूप है जो अल्पसंख्यकों की पसंद को दबाता है.

तो फिर भारत का असली खाना क्या है?

पुष्पेश पंत ने कहा, ‘जिसे हम ‘असली भारतीय खाना’ मान लेते हैं, वह पूरे भारत के हर वर्ग का खाना नहीं है, बल्कि समाज के कुछ खास और बड़े लोगों की पसंद है. भारतीय खाना किसी एक व्यंजन या एक शैली का नाम नहीं है. यह 5,000 साल पुरानी बातचीत है जमीन, भाषा, संस्कृति और जलवायु के बीच. पंजाब में सरसों का साग और मक्की की रोटी से लेकर केरल में मछली और नारियल करी तक, राजस्थान में दाल-बाटी-चूरमा से लेकर बंगाल में मछली और मिठाई तक, हर राज्य की अपनी कहानी है. तटीय इलाकों में नारियल, समुद्री भोजन और चावल प्रमुख हैं, जबकि अंदरूनी मैदानी इलाकों में गेहूं की रोटी, डेयरी और धीमी आंच पर पके मांस पसंद किए जाते हैं.’

पुष्पेश पंत ने आगे कहा, ‘दक्षिण भारत में चेट्टीनाड क्यूजीन अपने मसालेदार नॉनवेज के लिए मशहूर है, तो उत्तर प्रदेश की रसोई हल्के मसालों वाली शाकाहारी है. गोवा में पुर्तगाली प्रभाव से विंदालू और शकुती बने, तो कश्मीर में वाजवान नाम का 36-व्यंजनों का भोज परोसा जाता है. यह विविधता ही भारत की असली पहचान है.’

Xप्लेन: 80% मांसाहार भारतीयों के भारत का 'असली खाना' क्या? BRICS डिनर से बवाल

सियासत और थाली का रिश्ता

खाने की सियासत सिर्फ BRICS डिनर तक सीमित नहीं है. असम सरकार ने होटलों, रेस्टोरेंट और सार्वजनिक जगहों पर बीफ की सेवा और खपत पर प्रतिबंध लगा दिया है. लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) ने हॉस्टल परिसर में नॉनवेज पकाने पर रोक लगा दी, जिस पर समाजवादी पार्टी ने इसे ‘तुगलकी फरमान’ कहा.

दूसरी तरफ बीजेपी के अंदर भी अलग-अलग आवाजें हैं. वेंकैया नायडू ने खुद को नॉनवेज बताया और कहा कि ‘खाना निजी पसंद है.’ बंगाल में बीजेपी विधायक सुवेंदु अधिकारी ने मंदिर में नॉनवेज भोग खाया, जिस पर पार्टी ने कहा कि बंगाल की संस्कृति में यह सामान्य है. यानी खाने की सियासत में पार्टी की एकरूपता भी नहीं है.

इस पूरी बहस से एक बात साफ होती है कि भारत का असली खाना शाकाहारी या नॉनवेज में से कोई एक नहीं है. भारत का असली खाना विविधता है. यहां राजस्थान में जहां 71% लोग शाकाहारी हैं, वहीं नागालैंड में 99.8% लोग मांस खाते हैं. यहां जैन भोजन में प्याज-लहसुन भी नहीं डाला जाता, तो कश्मीरी वाज़वान में 36 तरह के नॉनवेज व्यंजन परोसे जाते हैं.

BRICS डिनर पर बहस इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह दिखाती है कि खाना सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं, बल्कि पहचान, ताकत और सियासत का मैदान है. सच यह भी है कि जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की बात हो, तो उसकी थाली में सबके लिए जगह होनी चाहिए. भारत की ताकत उसकी विविधता में है और उसकी थाली उसी विविधता का आईना है.





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