Xप्लेन: तेल 100 डॉलर के पार पहुंचना ‘ग्रेट फ्यूल क्राइसिस’ की शुरुआत है? समझें पूरा खेल

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<p style="text-align: justify;">16 सितंबर 2026 को ब्रेंट क्रूड 108.88 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड 105.01 डॉलर पर था. यह चार महीने का सबसे ऊंचा स्तर है. अगस्त 2026 की शुरुआत से ही ब्रेंट क्रूड में करीब 25% की बढ़ोतरी हो चुकी है. सितंबर की शुरुआत में ब्रेंट पहली बार सात हफ्तों में 100 डॉलर के पार गया था. जनवरी 2026 में IMF का अनुमान था कि तेल की कीमत घटकर 62 डॉलर तक आ जाएगी, लेकिन हकीकत ने उल्टा रुख लिया. <em><strong>तो क्या अब ग्रेट फ्यूल क्राइसिस आ गया है…</strong></em></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>यह ग्रेट फ्यूल क्राइसिस क्या बला है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">ग्रेट फ्यूल क्राइसिस कोई एक दिन में आया संकट नहीं है. यह सब कुछ अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध से शुरू हुआ. 28 फरवरी 2026 को ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को मिलिट्री कंट्रोल में ले लिया. यह जलडमरूमध्य दुनिया की 20% तेल खपत यानी रोजाना करीब 2 करोड़ बैरल तेल का रास्ता है. जब यह रास्ता बंद हुआ, तो पूरी दुनिया की तेल सप्लाई हिल गई.</p>
<p style="text-align: justify;">अंतर्राष्ट्रीय एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (IATA) की जून 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बंदी से कच्चे तेल की आपूर्ति में रोज करीब 1 करोड़ बैरल की कटौती हुई. यह वैश्विक खपत का लगभग 10% है. अगर रिफाइंड प्रोडक्ट्स और LNG को भी जोड़ लें, तो यह कटौती 1.5 करोड़ बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गई. इससे कच्चे तेल की कीमतें कुछ समय के लिए 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं.</p>
<p style="text-align: justify;">सोचिए, दुनिया की 10 में से 1 बैरल तेल अचानक गायब हो जाए. ऐसे में कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जो हुआ भी. हालांकि, कहानी यहीं खत्म नहीं होती.</p>
<p style="text-align: justify;">सितंबर 2026 में हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर हमला कर दिया. सऊदी अरब ने एहतियात के तौर पर इस पाइपलाइन को बंद कर दिया. यह पाइपलाइन इसलिए अहम थी क्योंकि यह होर्मुज जलडमरूमध्य को बायपास करके तेल को लाल सागर तक पहुंचाती थी. इस रूट से रोजाना करीब 70 लाख बैरल सऊदी क्रूड भेजा जाता था.</p>
<p style="text-align: justify;">इस हमले से रोज करीब 25 लाख बैरल तेल बाजार से बाहर हो गया. अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, यह 1,200 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन है. इसका बंद होना ग्लोबल ऑयल सप्लाई के 5% तक को प्रभावित कर रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;">सऊदी अरब का तेल उत्पादन अगस्त 2026 में 36 साल के सबसे निचले स्तर 62.38 लाख बैरल पर आ गया. लीबिया में भी प्रदर्शनों के कारण दो तेल क्षेत्रों और एक पंपिंग स्टेशन पर काम बंद हो गया. रूस-यूक्रेन युद्ध में भी दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले तेज कर दिए.</p>
<p style="text-align: justify;">अमेरिका का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व ऐतिहासिक रूप से बहुत निचले स्तर पर है. अगस्त 2026 तक यह घटकर लगभग 289.7 मिलियन बैरल रह गया, जो 1982 के बाद का सबसे निचला स्तर है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>डीजल ने तोड़ा रिकॉर्ड, पेट्रोल फिर से 4 डॉलर के ऊपर</strong></p>
<p style="text-align: justify;">होर्मुज़ बंद होने का सबसे तगड़ा असर डीजल पर पड़ा. अमेरिका में डीजल की कीमत 6.23 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है. पेट्रोल की कीमत 4 डॉलर प्रति गैलन से नीचे आ गई थी, फिर से 4.32 डॉलर पर पहुंच गई.</p>
<p style="text-align: justify;">अमेरिकी कच्चे तेल की कीमत पिछले तीन हफ्तों में करीब 19% बढ़कर 101 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>तेल महंगा होने से क्या-क्या होता है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इसे ऐसे समझें कि आपके घर में रोज सब्जी, दूध और आटा जैसी चीजें आती हैं, वह सब कहीं न कहीं एक ट्रक से आती हैं. ट्रक डीजल से चलता है. डीजल महंगा होगा, तो ट्रक वाला ज्यादा पैसा लेगा, तो सब्जी महंगी होगी. यही सिलसिला हर चीज में चलता है. तेल महंगा होने का मतलब है कि हर चीज महंगी हो जाएगी. इसे इकोनॉमिक्स की भाषा में ‘इन्फ्लेशन’ या महंगाई कहते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">IMF का कहना है कि अगर तेल की कीमत औसतन 100 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो एशिया और यूरोप में गैस की कीमतें 160% तक बढ़ सकती हैं. इससे ग्लोबल ग्रोथ 2.5% पर आ जाएगी और महंगाई 5.4% तक पहुंच जाएगी. IMF ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर हालात और बिगड़े, तो दुनिया मंदी के बेहद करीब पहुंच सकती है, जिसमें महंगाई 6% से ऊपर चली जाएगी.</p>
<p style="text-align: justify;">हर 10 डॉलर प्रति बैरल तेल की कीमत बढ़ने पर बड़ी तेल-आयातक अर्थव्यवस्थाओं की सालाना GDP ग्रोथ में 0.1 से 0.5 प्रतिशत अंक तक की कमी आ सकती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ट्रंप सरकार कह रही है ‘यह टेम्पररी है’, लेकिन&hellip;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति <a title="डोनाल्ड ट्रंप" href="https://www.abplive.com/topic/donald-trump" data-type="interlinkingkeywords">डोनाल्ड ट्रंप</a> की सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि यह संकट टेम्पररी है. गृह मंत्री डग बर्गम ने 15 सितंबर 2026 को ह्यूस्टन में G-20 कार्यक्रम में कहा कि कीमतें पिछली सरकार के समय भी इतनी ही थीं और अमेरिकियों को ये कीमतें हमेशा चुकानी पड़तीं. बर्गम ने कहा, ‘अगर आप कीमतों के बारे में लिखना चाहते हैं, तो टेम्पररी शब्द जरूर शामिल करें, क्योंकि यह एक टेम्पररी प्रॉब्लम है.'</p>
<p style="text-align: justify;">तेल कंपनियों के CEO इस बात से सहमत नहीं हैं. अमेरिकी तेल कंपनी शेवरॉन के CEO माइक विर्थ ने साफ कहा कि वे यह नहीं बता सकते कि कीमतें कहां जाएंगी, लेकिन फिलहाल ऐसा कोई कारण नहीं दिख रहा जिससे कीमतें जल्दी नीचे आएं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्ट्रैटेजिक रिजर्व भी खत्म होने की कगार पर</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जब तेल संकट आता है, तो देश अपने स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व से तेल निकालकर कीमतें काबू में रखने की कोशिश करते हैं. इस बार वह हथियार भी काम नहीं कर रहा. दुनिया भर में कमर्शियल ईंधन स्टॉक छह महीने से ज्यादा समय से घट रहे हैं. स्ट्रैटेजिक रिजर्व को इससे ज्यादा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भारत पर क्या असर?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत के लिए यह संकट और भी गंभीर था, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का करीब 88.6% कच्चा तेल आयात करता है. इसमें से लगभग 30% होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है. RBI की रिसर्च के मुताबिक, तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी महंगाई दर में करीब 49 बेसिस पॉइंट्स (0.49%) जोड़ सकती है.</p>
<p style="text-align: justify;">हालांकि, भारत ने काबिले तारीफ काम किया है. भारत ने तेजी से अपने तेल आयात के रास्ते बदले. कुछ ही हफ्तों में होर्मुज के बाहर से आयात 55% से बढ़कर 70% हो गया. भारतीय नौसेना ने ‘ऑपरेशन संकल्प’ शुरू किया और टैंकरों को खाड़ी से बाहर निकालने में मदद की.</p>
<p style="text-align: justify;">भारत ने LPG का उत्पादन भी बढ़ाया. सिर्फ पांच दिनों में घरेलू LPG उत्पादन 35,000 टन प्रतिदिन से बढ़कर 54,000 टन प्रतिदिन हो गया. सरकार ने लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये की एक्साइज ड्यूटी में कटौती की, ताकि आम आदमी को कीमतों का असर न पड़े. नतीजतन, जब UAE में डीजल की कीमतें 85% तक बढ़ गईं, तब भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी सिर्फ एक अंक में रही.</p>
<p style="text-align: justify;">भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 4 सितंबर 2026 तक 785.7 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट भी अभी 0.8% पर कंट्रोल में है. हालांकि, अगर तेल 100 डॉलर से ऊपर कई महीनों तक बना रहा, तो FY27 में CAD बढ़कर 1.9-2.2% हो सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अमेरिका में गैस का संकट के क्या मायने?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अब तक की कहानी तेल की थी, लेकिन असली परेशानी अमेरिका के अंदर नेचुरल गैस को लेकर है. अमेरिका में शेल गैस का उत्पादन धीमा पड़ रहा है और <a title="मौसम" href="https://www.abplive.com/weather" data-type="interlinkingkeywords">मौसम</a> की मार पड़ रही है. कभी भीषण सर्दी, तो कभी भीषण गर्मी. सबसे बड़ी बात है कि AI डेटा सेंटर बेतहाशा बिजली खा रहे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के मुताबिक, LNG एक्सपोर्ट फैसिलिटीज की मांग भी तेजी से बढ़ रही है. 2026 में LNG एक्सपोर्ट 9% बढ़ने की उम्मीद है और 2027 में 11%. यानी अमेरिका की गैस विदेश जा रही है, जबकि अंदर ही अंदर कीमतें बढ़ रही हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>तो क्या ग्लोबल रिसेशन आएगा?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि युद्ध कब खत्म होता है और होर्मुज जलडमरूमध्य कब खुलता है. IMF का बेस केस मानता है कि संघर्ष जल्दी खत्म हो जाएगा, तेल की कीमतों में 19% की बढ़ोतरी होगी, ग्लोबल ग्रोथ 3.1% रहेगी और महंगाई 4.4% रहेगी. लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ, तो ‘एडवर्स’ केस में ग्रोथ 2.5% पर आ जाएगी और महंगाई 5.4% तक जाएगी.</p>
<p style="text-align: justify;">सबसे बुरे ‘सीवियर’ केस में दुनिया रिसेशन के बेहद करीब होगी. महंगाई 6% से ऊपर जाएगी और अलग-अलग देशों में तेल की कीमत 2026 में औसतन 110 डॉलर और 2027 में 125 डॉलर तक पहुंच सकती है.</p>
<p style="text-align: justify;">IMF के फाइनेंशियल काउंसलर टोबियास एड्रियन ने कहा है कि इस समय बैंकिंग सिस्टम की चिंता की कोई बड़ी वजह नहीं है. बड़े बैंकों की कैपिटल रेशियो मल्टी-डिकेड हाई पर है.</p>
<p style="text-align: justify;">तेल की कीमत 100 डॉलर के पार जाना सिर्फ एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है. यह उस दुनिया की कहानी है जहां एक जलडमरूमध्य में हमला होता है, तो दिल्ली के एक ऑटो वाले की जेब पर असर पड़ता है. यह उस दुनिया की कहानी है जहां सऊदी अरब का तेल उत्पादन 36 साल के निचले स्तर पर आ जाता है, तो नाइजीरिया से लेकर फिलीपींस तक के लोगों की रोटी महंगी हो जाती है.</p>



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