
भले ही उम्र डिमेंशिया का सबसे बड़ा कारण मानी जाती है, लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया है कि यह बीमारी लोगों की सोच से कहीं पहले शुरू हो सकती है. एक नई लंबी रिसर्च में सामने आया है कि जो लोग अपनी 50 की उम्र तक डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और स्मोकिंग से दूर रहते हैं, वे उन लोगों के मुकाबले करीब 12.6 साल ज्यादा डिमेंशिया-फ्री जिंदगी जी सकते हैं, जिन्हें ये तीनों समस्याएं होती हैं. यानी दिमाग को सुरक्षित रखने की शुरुआत याददाश्त कमजोर होने से बहुत पहले ही करनी होती है. यह रिसर्च 12,400 से ज्यादा लोगों पर 26 साल तक की गई ARIC स्टडी पर आधारित है, जिसमें यह देखा गया कि 55 से 95 साल की उम्र के बीच लोग बिना डिमेंशिया के कितने साल जी पाए थे.

बहुत से लोग सोचते हैं कि डिमेंशिया अचानक बुढ़ापे में आ जाता है, लेकिन असल में इसका नुकसान बहुत पहले से चुपचाप शुरू हो जाता है. इसी स्टडी में पाया गया कि जिन लोगों को 55 साल की उम्र में कोई बड़ी बीमारी नहीं थी, वे करीब 30.1 साल बिना डिमेंशिया के जी पाए. वहीं जिन्हें डायबिटीज, हाई बीपी और स्मोकिंग तीनों थीं, वे सिर्फ 17.5 साल ही डिमेंशिया-फ्री रह पाए हैं. यानी तीनों परेशानी एक साथ होने पर डिमेंशिया का खतरा करीब 2.7 गुना बढ़ जाता है, और बिना डिमेंशिया के मरने का खतरा भी 5 गुना ज्यादा हो जाता है. इससे साफ पता चलता है कि दिल और दिमाग की सेहत आपस में गहराई से जुड़ी हुई होती है.

ये तीनों बीमारियां शरीर के अलग-अलग हिस्सों को प्रभावित करती हैं, लेकिन आखिर में असर दिमाग पर ही डालती हैं. डॉक्टर के मुताबिक हाई ब्लड प्रेशर दिमाग की छोटी blood vessels को नुकसान पहुंचाता है, जिससे खून का बहाव कम हो जाता है और सालों तक यह नुकसान अंदर ही अंदर बढ़ता रहता है. वहीं डायबिटीज की वजह से शरीर में सूजन और तनाव बढ़ता है, जिससे blood vessels को चोट पहुंचती है. वहीं स्मोकिंग करने की आदत भी इसमें उतनी ही भूमिका नीभाती है, जो blood vessels को सिकोड़ देती है, जिससे ऑक्सीजन कम पहुंचती है और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है.

यह स्टडी खासतौर पर मिडलाइफ यानी 40 और 50 की उम्र पर जोर देती है, क्योंकि यही वह समय होता है जब शरीर में बीपी बढ़ना या शुगर लेवल बिगड़ना जैसी समस्याएं धीरे-धीरे शुरू होती हैं, भले ही इंसान अपने अंदर कुछ बदलाव महसूस न कर रहा हो. ऐसे में डॉक्टर कहते हैं कि डिमेंशिया को बुढ़ापे का हिस्सा नहीं मानना चाहिए, क्योंकि इसके कई मामले हमारी रोजमर्रा की आदतों से जुड़े होते हैं. बल्कि ब्लड प्रेशर और शुगर को कंट्रोल में रखना, स्मोकिंग पूरी तरह छोड़ना, रोज एक्सरसाइज करना, अच्छी नींद लेना, सही खानपान रखना और लोगों से जुड़े रहना, ये सारी आदतें मिलकर डिमेंशिया के खतरे को काफी कम कर सकती हैं.

कभी-कभी किसी का नाम भूल जाना या चाबी कहीं रख कर भूल जाना आम बात है, खासकर तनाव के दौरान. लेकिन अगर यह भूलने की आदत बार-बार होने लगे और रोजमर्रा के काम में रुकावट डालने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ऐसे में आपको फौरन डॉक्टर सलाह लेनी चाहिए खासतौर पर जिन लोगों को पहले से हाई बीपी, डायबिटीज, स्मोकिंग की आदत या दिल से जुड़ी कोई बीमारी रह चुकी है, उन्हें अपनी यादाश और सोचने-समझने की क्षमता पर खास ध्यान देना चाहिए.

इस रिसर्च की सबसे अच्छी बात यह है कि यह डर की जगह उम्मीद दिखाती है. यह बताती है कि दिमाग की सेहत किसी एक दवा या एक परफेक्ट डाइट से तय नहीं होती, बल्कि सालों तक अपनाई गई रोजमर्रा की आदतों से बनती है. यह स्टडी यह नहीं कहती कि डिमेंशिया को हमेशा रोका जा सकता है, क्योंकि जेनेटिक्स और उम्र जैसे कारण भी इस पर असर डालते हैं.
Published at : 07 Aug 2026 08:26 AM (IST)