भारत के कैंसर अस्पतालों में हर दिन एक ही नजारा देखने को मिलता है, 70% से ज्यादा मरीज ऐसे आते हैं जिनका कैंसर आखिरी स्टेज पर पहुंच चुका होता है. इस स्टेज पर इलाज महंगा और मुश्किल होता है. कामयाबी की संभावना बहुत कम हो जाती है. पिछले दो दशकों में भारत ने दुनिया के बेहतरीन कैंसर सेंटर बनए हैं, रेडिएशन थेरेपी और सर्जरी के आधुनिक तरीके अपनाए हैं, लेकिन ये सारी तरक्की तब बेकार हो जाती है, जब मरीज इतनी देर से आएं कि कुछ किया न जा सके. तो आखिर कैसे भारत कैंसर से बच सकता है…
भारत में कितना बड़ा है कैंसर का संकट?
अमेरिकन कैंसर सोसाइटी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में भारत में 15.33 लाख नए कैंसर के मामले दर्ज किए गए. वहीं, कैंसर से होने वाली मौतों का आंकड़ा 8.74 लाख तक पहुंच गया. बात सिर्फ इतनी नहीं है, 2015 से 2024 के बीच कैंसर के मामलों में 10.4% की बढ़ोतरी हुई है. कैंसर से मौतों में 28.6% का उछाल आया है. यानी मौतें तीन गुना तेजी से बढ़ रही हैं. यह साफ संकेत है कि हम मरीजों को समय रहते नहीं बचा पा रहे हैं.
हर 9 में से 1 भारतीय को अपनी जिंदगी में कभी न कभी कैंसर होने का खतरा है. कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में तो यह खतरा 20% से भी ज्यादा है. बढ़ती उम्र और बदलती जीवनशैली के साथ यह आंकड़ा और बढ़ेगा.
इलाज में देर से आना क्यों है सबसे बड़ी समस्या?
दिल्ली के एक्शन कैंसर हॉस्पिटल और एक्शन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल ऑनकोलॉजी एंड इम्यूनोथैरेपी के डायरेक्टर डॉ. जे. बी. शर्मा बताते हैं, भारत में कैंसर की पहचान अक्सर तब होती है जब लक्षण इतने गंभीर हो जाएं कि रोजमर्रा की जिंदगी मुश्किल हो जाए. तब तक ठीक करने के मौके हाथ से निकल चुके होते हैं. इस देरी की कीमत सिर्फ जान नहीं है, बल्कि यह गरीबी की वजह भी बनती है. कैंसर से पीड़ित 75% से ज्यादा परिवारों को इलाज के खर्च ने आर्थिक रूप से तबाह कर दिया है.
भारत में फेफड़ों के कैंसर से 5 साल तक जीवित रहने की दर सिर्फ 4% है, जबकि जापान में यह 33% है. यह फर्क इलाज की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि यह उस स्टेज का है जब मरीज डॉक्टर के पास पहुंचता है.
तो कैसे बदलेगी यह तस्वीर?
डॉ. जे. बी. शर्मा के मुताबिक, इसके लिए तीन बड़े कदम उठाने होंगे:
कदम-1: स्कूलों से शुरू होगी बदलाव की क्रांति
कैंसर से बचाव की बात करें तो लगभग आधे कैंसर रोके जा सकते हैं. लेकिन बड़ों को जागरूक करने से फायदा सीमित होता है, क्योंकि जीवनशैली की आदतें बचपन में ही पक्की हो जाती हैं. एक बार आदतें बन गईं तो जागरूकता अभियानों से उन्हें बदलना बहुत मुश्किल है.
इस वजह से स्वास्थ्य शिक्षा स्कूलों से शुरू होनी चाहिए, जहां ‘जीवन कौशल’ को गणित और विज्ञान जितना ही महत्व दिया जाए. ये जीवन कौशल सिर्फ कैंसर से ही नहीं, बल्कि दिल की बीमारी, डायबिटीज, न्यूरोलॉजिकल और ब्लड वेसल्स से जुड़ी बीमारियों से भी बचाएंगे. इसमें शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य, नशे से बचाव, खानपान, वैक्सीनेशन और परिवार-समाज के लिए जिम्मेदारियां सब शामिल होनी चाहिए.
कदम- 2: तीन हफ्ते का नियम और स्क्रीनिंग की ताकत
आम आदमी को बस एक बात याद रखनी चाहिए कि अगर कोई लक्षण तीन हफ्ते से ज्यादा बना रहे तो डॉक्टर को दिखाओ. यह एक आसान सा नियम कैंसर की पहचान में बड़ी देरी को कम कर सकता है, लेकिन जागरूकता अकेले काफी नहीं है. स्क्रीनिंग हमारा सबसे ताकतवर हथियार है, लेकिन जब लक्षण दिखने से पहले ही कैंसर का पता लग जाए. अब तक स्क्रीनिंग ज्यादातर सर्वाइकल, ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर तक ही सीमित थी. अब विज्ञान ने नए रास्ते खोले हैं.
कदम- 3: एक ब्लड सैंपल में 10 कैंसर की पहचान
सबसे बड़ी उम्मीद मल्टी-कैंसर अर्ली डिटेक्शन (MCED) टेस्ट से है. यह एक ब्लड टेस्ट है जो एक ही सैंपल में 10 तरह के कैंसर के बायोलॉजिकल सिग्नल पकड़ सकता है. कोलोरेक्टल, फेफड़ा, लिवर, पैंक्रियाज, ओवेरियन, गैस्ट्रिक, एसोफेजियल, ब्रेस्ट, प्रोस्टेट और ब्लैडर कैंसर.
जुलाई 2026 में अपोलो कैंसर सेंटर्स ने शील्ड मल्टी-कैंसर डिटेक्शन (MCD) टेस्ट भारत में लॉन्च किया है. यह 45 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोगों के लिए डिजाइन किया गया है. जायडस लाइफसाइंसेज ने अपोलो हॉस्पिटल्स के साथ मिलकर इसे पूरे देश में उपलब्ध कराने के लिए समझौता किया है. हालांकि इसे पूरे देश में लागू करने से पहले सावधानीपूर्वक मूल्यांकन की जरूरत है, लेकिन यह कैंसर रिसर्च के सबसे उम्मीद भरे क्षेत्रों में से एक है.
भारत के हिसाब से अपना मॉडल
1.4 अरब लोगों के देश में एक ही स्क्रीनिंग प्रोग्राम काम नहीं कर सकता. भारत को अपनी हकीकत के हिसाब से समाधान बनाने होंगे. एक लेयर्ड मॉडल जिसमें शामिल हो:
- कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स गांव-गांव जाकर लोगों को समझाएं.
- डिजिटल रिस्क असेसमेंट के जरिए ऑनलाइन टूल्स से पहचान करना आसान.
- AI की मदद से एक्स-रे और रिपोर्ट्स पढ़कर खतरे के संकेत बताए.
- मोबाइल डायग्नोस्टिक सर्विसेज से दूरदराज के इलाकों तक पहुंच.
- प्राइमरी केयर से कैंसर सेंटर तक की मजबूत रेफरल व्यवस्था.
NITI Aayog का इमेजिंग बायोबैंक
अच्छी खबर यह है कि नींव पहले से पड़ रही है. NITI Aayog 20,000 से ज्यादा कैंसर मरीजों की रेडियोलॉजी और पैथोलॉजी इमेजेज का डेटाबेस बना रहा है. यह इमेजिंग बायोबैंक AI टूल्स को ट्रेन करने में मदद करेगा, ताकि फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स संदिग्ध नोड्यूल्स की पहचान कर सकें और मरीजों को सही विशेषज्ञ के पास भेज सकें.
नेशनल हेल्थ रिसर्च पॉलिसी 2026
ड्राफ्ट नेशनल हेल्थ रिसर्च पॉलिसी 2026 इस बदलाव को तेज करने का मौका देती है. इसके तहत 2047 तक स्वास्थ्य अनुसंधान पर खर्च को मौजूदा स्तर से 6.25 गुना बढ़ाने का लक्ष्य है. कैंसर, टीबी, डायबिटीज, हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य जैसी बड़ी बीमारियों को प्राथमिकता दी जाएगी. AI, डिजिटल हेल्थ, डेटा साइंस, सेल और जीन थेरेपी जैसे इमर्जिंग एरियाज पर भी फोकस होगा.
यह नीति ‘पब्लिकेशन-ड्रिवन’ से ‘इम्प्लीमेंटेशन साइंस’ की ओर शिफ्ट का संकेत देती है. यानी रिसर्च सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि असल जिंदगी में बदलाव लाए.
कैंसर के खिलाफ जंग जीतने का असल पैमाना क्या है?
डॉ. जे. बी. शर्मा कहते हैं कि भारत को कैंसर केयर में तरक्की का पैमाना इस बात से नहीं लगाना चाहिए कि हमारे पास कितने आधुनिक इलाज के साधन हैं. असली कामयाबी इस बात में है कि कितने कैंसर कभी आखिरी स्टेज पर नहीं पहुंचे. इसके लिए सरकारी एजेंसियों, मेडिकल कॉलेजों, टेक्नोलॉजी कंपनियों और कम्युनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स के बीच तालमेल की जरूरत है. स्कूलों में हेल्थ एजुकेशन, तीन हफ्ते का नियम, मल्टी-कैंसर ब्लड टेस्ट, AI से लैस स्क्रीनिंग, और एक मजबूत रिसर्च पॉलिसी मिलकर भारत को कैंसर के खिलाफ जंग में जीत दिला सकते हैं.
सवाल यह नहीं है कि क्या हम यह कर सकते हैं. सवाल यह है कब से शुरू करेंगे?
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