दादा थे चंबल के डाकू, लेकिन पोते ने चुनी पढ़ाई और बना IRTS अफसर


कहीं असफल प्रयासों के बाद उन्होंने यूपीएससी सिविल सर्विस एग्जामिनेशन 2025 में ऑल इंडिया रैंक 629 हासिल की. इसके बाद उनका चयन इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस के लिए हुआ और अब वह रेल मंत्रालय में सेवाएं दे रहे हैं. देव प्रभाकर सिंह तोमर ने अपनी कहानी बताते हुए कहा कि उनकी जिंदगी की शुरुआत को समझने के लिए उनके दादा की कहानी जानना जरूरी है. उनके अनुसार करीब 75 साल पहले पारिवारिक परेशानी और उस समय के अधिकारियों के साथ विवाद के बाद उनके दादा बागी बन गए थे.

कहीं असफल प्रयासों के बाद उन्होंने यूपीएससी सिविल सर्विस एग्जामिनेशन 2025 में ऑल इंडिया रैंक 629 हासिल की. इसके बाद उनका चयन इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस के लिए हुआ और अब वह रेल मंत्रालय में सेवाएं दे रहे हैं. देव प्रभाकर सिंह तोमर ने अपनी कहानी बताते हुए कहा कि उनकी जिंदगी की शुरुआत को समझने के लिए उनके दादा की कहानी जानना जरूरी है. उनके अनुसार करीब 75 साल पहले पारिवारिक परेशानी और उस समय के अधिकारियों के साथ विवाद के बाद उनके दादा बागी बन गए थे.

दादा के इस रास्ते पर जाने के बाद परिवार के लिए समस्याएं बढ़ गई. देव ने बताया कि एक समय ऐसा भी था, जब परिवार के पास खाने तक के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे, बाद में उनके चाचा भी बागी बन गए. परिवार की परिस्थितियों को देखते हुए देव के पिता ने अलग रास्ता अपनाने का फैसला किया गया. जिसके वह अपने बड़ों को बताएं बिना ग्वालियर चले गए, वहां उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और आगे चलकर शिक्षक बने. परिवार की पिछली पीढ़ी के मुकाबले यह बिल्कुल अलग दिशा थी.

दादा के इस रास्ते पर जाने के बाद परिवार के लिए समस्याएं बढ़ गई. देव ने बताया कि एक समय ऐसा भी था, जब परिवार के पास खाने तक के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे, बाद में उनके चाचा भी बागी बन गए. परिवार की परिस्थितियों को देखते हुए देव के पिता ने अलग रास्ता अपनाने का फैसला किया गया. जिसके वह अपने बड़ों को बताएं बिना ग्वालियर चले गए, वहां उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और आगे चलकर शिक्षक बने. परिवार की पिछली पीढ़ी के मुकाबले यह बिल्कुल अलग दिशा थी.

वहीं देव ने शुरुआती 5 साल की पढ़ाई मध्य प्रदेश बोर्ड से की. इसके बाद छठी कक्षा में उनका एडमिशन सीबीएसई में हुआ. ग्रामीण माहौल में रहने वाले देव के लिए नया स्कूल आसान नहीं था, भाषा और वातावरण दोनों अलग थी जिसकी वजह से उन्हें दूसरे छात्रों के साथ घुलने-मिलने में परेशानी हुई. वहीं कक्षा 11वीं में उन्होंने पहली बार आईआईटी के बारे में सोचा और आईआईटी की तैयारी शुरू कर दी. वहीं आर्थिक स्थिति सही नहीं होने के कारण उन्होंने घर पर किताबों से तैयारी की और 12वीं की परीक्षा के साथ आईआईटी प्रवेश परीक्षा दी.

वहीं देव ने शुरुआती 5 साल की पढ़ाई मध्य प्रदेश बोर्ड से की. इसके बाद छठी कक्षा में उनका एडमिशन सीबीएसई में हुआ. ग्रामीण माहौल में रहने वाले देव के लिए नया स्कूल आसान नहीं था, भाषा और वातावरण दोनों अलग थी जिसकी वजह से उन्हें दूसरे छात्रों के साथ घुलने-मिलने में परेशानी हुई. वहीं कक्षा 11वीं में उन्होंने पहली बार आईआईटी के बारे में सोचा और आईआईटी की तैयारी शुरू कर दी. वहीं आर्थिक स्थिति सही नहीं होने के कारण उन्होंने घर पर किताबों से तैयारी की और 12वीं की परीक्षा के साथ आईआईटी प्रवेश परीक्षा दी.

इसके बाद उनका चयन आईआईटी रोपड़ में हुआ, जहां उन्हें इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.  आईआईटी से पढ़ाई के बाद देव को कैंपस प्लेसमेंट के जरिए नौकरी नहीं मिली, इसलिए उन्होंने बाहर से अवसर तलाशने शुरू किए. इसी दौरान उन्होंने फिलिप्स में काम करने का मौका मिला और वह नीदरलैंड चले गए. उन्होंने एम्सटर्डम के पास काम किया और बाद में उन्हें फ्री प्लेसमेंट ऑफर भी मिला. इसके बाद उन्हें यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा देने का विचार आया.

इसके बाद उनका चयन आईआईटी रोपड़ में हुआ, जहां उन्हें इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.  आईआईटी से पढ़ाई के बाद देव को कैंपस प्लेसमेंट के जरिए नौकरी नहीं मिली, इसलिए उन्होंने बाहर से अवसर तलाशने शुरू किए. इसी दौरान उन्होंने फिलिप्स में काम करने का मौका मिला और वह नीदरलैंड चले गए. उन्होंने एम्सटर्डम के पास काम किया और बाद में उन्हें फ्री प्लेसमेंट ऑफर भी मिला. इसके बाद उन्हें यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा देने का विचार आया.

देव को नौकरी के साथ यूपीएससी की तैयारी करना मुश्किल लगा. इसलिए उन्होंने नीदरलैंड की नौकरी छोड़कर भारत लौटने का फैसला लिया. उनके इस फैसले को लेकर उन्हें परिवार की आलोचना झेलनी पड़ी. वहीं यूपीएससी के पहले प्रयास में वह पास नहीं हो सके और कट ऑफ से 12.5 अंक पीछे रह गए. दूसरे प्रयास में अंतर घटकर 2.5 अंक रह गया, लेकिन सफलता फिर भी नहीं मिली.

देव को नौकरी के साथ यूपीएससी की तैयारी करना मुश्किल लगा. इसलिए उन्होंने नीदरलैंड की नौकरी छोड़कर भारत लौटने का फैसला लिया. उनके इस फैसले को लेकर उन्हें परिवार की आलोचना झेलनी पड़ी. वहीं यूपीएससी के पहले प्रयास में वह पास नहीं हो सके और कट ऑफ से 12.5 अंक पीछे रह गए. दूसरे प्रयास में अंतर घटकर 2.5 अंक रह गया, लेकिन सफलता फिर भी नहीं मिली.

असफलता के बाद भी उन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी और प्रीलिम्स और मेन्स परीक्षा पास कर इंटरव्यू तक पहुंचे. लेकिन अंतिम सूची में उनका नाम नहीं आया. उन्होंने दोबारा प्रयास किया इस दौरान उन्होंने दिल्ली में शिक्षक के तौर पर भी काम शुरू किया. परिवार ने भी उन्हें तैयारी जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया. नौकरी करते हुए फिर यूपीएससी परीक्षा के प्रीलिम्स और मेन्स के बाद इंटरव्यू तक पहुंचे.

असफलता के बाद भी उन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी और प्रीलिम्स और मेन्स परीक्षा पास कर इंटरव्यू तक पहुंचे. लेकिन अंतिम सूची में उनका नाम नहीं आया. उन्होंने दोबारा प्रयास किया इस दौरान उन्होंने दिल्ली में शिक्षक के तौर पर भी काम शुरू किया. परिवार ने भी उन्हें तैयारी जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया. नौकरी करते हुए फिर यूपीएससी परीक्षा के प्रीलिम्स और मेन्स के बाद इंटरव्यू तक पहुंचे.

जब 2025 का अंतिम रिजल्ट आया तो देव अपनी पत्नी के साथ घर पर थे.वहीं पिछली बार की तरह इस बार भी उन्होंने लिस्ट में अपना नाम सर्च करना शुरू किया. लेकिन इस बार कहानी अलग थी, लिस्ट में देव प्रभाकर सिंह तोमर का नाम मौजूद था. उन्होंने रोल नंबर से इसकी पुष्टि की, वहीं यूपीएससी सिविल सर्विस एग्जामिनेशन में 629वीं रैंक मिली. इसके बाद उनका चयन इंडियन रेलवे ट्रैफिक के लिए हुआ

जब 2025 का अंतिम रिजल्ट आया तो देव अपनी पत्नी के साथ घर पर थे.वहीं पिछली बार की तरह इस बार भी उन्होंने लिस्ट में अपना नाम सर्च करना शुरू किया. लेकिन इस बार कहानी अलग थी, लिस्ट में देव प्रभाकर सिंह तोमर का नाम मौजूद था. उन्होंने रोल नंबर से इसकी पुष्टि की, वहीं यूपीएससी सिविल सर्विस एग्जामिनेशन में 629वीं रैंक मिली. इसके बाद उनका चयन इंडियन रेलवे ट्रैफिक के लिए हुआ

Published at : 03 Oct 2026 07:18 AM (IST)

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