टाटा समूह का विवाद अब सिर्फ कंपनी के बोर्ड और शेयरहोल्डर्स तक नहीं रह गया है. देश-विदेश के छह पारसी और जोरोएस्ट्रियन संगठनों ने इस मामले में अपनी बात रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है. इन संगठनों का कहना है कि टाटा समूह की मौजूदा व्यवस्था ने उसे लंबे समय तक कारोबार के साथ समाजसेवा और देश के विकास पर भी ध्यान देने में मदद की है. ऐसे में इस ढांचे में बदलाव का असर कंपनी की पहचान पर पड़ सकता है.
इन दिनों जब टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा सन्स के भविष्य को लेकर चर्चा तेज हुई है तब ही ये विवाद भी सामने आया है. सवाल ये है कि क्या टाटा सन्स शेयर बाजार में लिस्ट होगी या फिर पहले की तरह निजी कंपनी बनी रहेगी?
पारसी संगठनों ने पत्र में क्या कहा?
फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, छह पारसी और जोरोएस्ट्रियन संगठनों ने 7 अक्टूबर को लिखे पत्र में टाटा ट्रस्ट्स और टाटा परिवार के प्रति समर्थन जताया है. संगठनों ने कहा कि टाटा सन्स के मौजूदा मालिकाना ढांचे को सुरक्षित रखना जरूरी है.
इन संगठनों का मानना है कि टाटा ट्रस्ट्स की बड़ी हिस्सेदारी की वजह से समूह लंबे समय के लक्ष्यों पर काम कर पाया है. कंपनी के फैसलों में सिर्फ तुरंत मुनाफा कमाने के बजाय समाजसेवा, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी को भी अहमियत मिली है. पत्र में ये भी कहा गया कि टाटा समूह की पहचान और विरासत को बनाए रखना सिर्फ एक कारोबारी मामला नहीं है, बल्कि इसका संबंध देश के व्यापक हित से भी है.
टाटा सन्स की लिस्टिंग पर क्यों छिड़ी बहस?
टाटा सन्स, टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी है. समूह की कई बड़ी कंपनियां इसी के तहत आती हैं. टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा सन्स की करीब 66% हिस्सेदारी है. यही वजह है कि टाटा ट्रस्ट्स का कंपनी के फैसलों और उसके भविष्य पर काफी प्रभाव है.
विवाद की बड़ी वजह भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI का फैसला है. RBI ने टाटा सन्स की उस अर्जी को मंजूर नहीं किया, जिसमें कंपनी ने कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के तौर पर अपना रजिस्ट्रेशन छोड़ने की अनुमति मांगी थी. टाटा सन्स को अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) के नियमों के तहत रखा गया है. इन नियमों के तहत आने वाली कंपनियों पर शेयर बाजार में लिस्टिंग से जुड़ी शर्तें लागू होती हैं. इसी वजह से टाटा सन्स के सामने अब नियामकीय नियमों का पालन करने का दबाव है. हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स लिस्टिंग के पक्ष में नहीं है और चाहता है कि कोई भी फैसला लेने से पहले दूसरे कानूनी विकल्पों पर भी विचार किया जाए.
लिस्टिंग से क्या होगा?
टाटा ट्रस्ट्स और अब पारसी संगठनों की चिंता यह है कि अगर टाटा सन्स शेयर बाजार में लिस्ट होती है, तो कंपनी पर शेयरधारकों की कम समय में बेहतर रिटर्न देने की उम्मीद का दबाव बढ़ सकता है.
अभी टाटा ट्रस्ट्स की बड़ी हिस्सेदारी होने से समूह को लंबे समय के प्रोजेक्ट्स में निवेश करने और सामाजिक कामों को समर्थन देने की गुंजाइश मिलती है. अगर कंपनी की ओनरशिप और काम करने के तरीके में बदलाव आता है, तो उसके फैसलों पर भी असर पड़ सकता है. हालांकि, यह संगठनों की आशंका है. लिस्टिंग होने की स्थिति में टाटा समूह के कारोबार या समाजसेवा पर कितना असर पड़ेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आगे कौन-सा ढांचा अपनाया जाता है.
IT से लेकर डिफेंस तक का जिक्र
पारसी संगठनों ने अपने पत्र में टाटा समूह के उन कारोबारों का भी जिक्र किया, जो देश के विकास के लिहाज से अहम हैं. इनमें आईटी, डिफेंस, सेमीकंडक्टर, क्लीन एनर्जी और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे क्षेत्र शामिल हैं. संगठनों का कहना है कि टाटा समूह ने लंबे समय के नजरिए से निवेश करके इन क्षेत्रों में अपनी भूमिका बनाई है. इसलिए उसके मालिकाना ढांचे में किसी भी बदलाव पर व्यापक हित को ध्यान में रखकर विचार किया जाना चाहिए.
किन छह संगठनों ने लिखा पत्र?
- बॉम्बे पारसी पंचायत (BPP)
- फेडरेशन ऑफ पारसी जोरोएस्ट्रियन अंजुमन्स ऑफ इंडिया (FPZAI)
- फेडरेशन ऑफ जोरोएस्ट्रियन एसोसिएशन्स ऑफ नॉर्थ अमेरिका (FEZANA)
- जोरोएस्ट्रियन ट्रस्ट फंड्स ऑफ यूरोप (ZTFE)
- ग्लोबल काउंसिल ऑफ जोरोएस्ट्रियन्स ट्रस्ट (GCZT)
- वर्ल्ड जोरोएस्ट्रियन चैंबर ऑफ कॉमर्स (WZCC)
इन संगठनों की अपील के बाद टाटा सन्स की लिस्टिंग और टाटा ट्रस्ट्स के मालिकाना मॉडल पर चल रही बहस को नया आयाम मिला है. फिलहाल सवाल यही है कि कंपनी RBI के नियमों का पालन करते हुए अपने मौजूदा ढांचे को किस तरह बनाए रख सकती है.
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