देशभर के मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के लिए आयोजित होने वाली नीट यूजी की काउंसलिंग प्रक्रिया का अंतिम दौर खत्म होने के बाद भी एमबीबीएस की 800 से ज्यादा सीटें खाली रह गई है. देश में जहां एक-एक एमबीबीएस सीट के लिए लाखों परीक्षार्थी कड़ी मेहनत करते हैं, वहीं स्ट्रे वेकेंसी राउंड के बाद भी 837 सीटों का बिना भरा रह जाना मेडिकल उम्मीदवारों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है. मेडिकल काउंसलिंग कमेटी की ओर से जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार खाली रह गई, ज्यादातर सीटें तमिलनाडु और पुडुचेरी की डीम्ड मेडिकल यूनिवर्सिटी से जुड़ी है, जहां सालाना ट्यूशन फीस करोड़ों रुपये में पहुंच रही है.
कहां की और कितनी सीटें रह गई खाली?
काउंसलिंग के अंतिम दौर के बाद देशभर में कुल 837 एमबीबीएस सीटें खाली रह गई है. इनमें से अकेली 824 सीटें तमिलनाडु और पुडुचेरी यूनिवर्सिटी की है. इनमें श्री सत्या साईं मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, चेन्नई में 188 सीटें खाली है. मीनाक्षी मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, कांचीपुरम में 117 सीटें खाली है. महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुडुचेरी में 92 सीट खाली है. श्री बालाजी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, चेन्नई में 82 सीटें खाली है. चेत्तीनाद अस्पताल एवं अनुसंधान संस्थान, कोलार में 12 सीटें खाली है और एम्स मदुरई में एक सीट खाली है.
फीस का भारी बोझ बना सबसे बड़ी रुकावट
एक्सपर्ट्स के अनुसार इन सीटों के खाली रहने की सबसे बड़ी वजह डीम्ड यूनिवर्सिटीज की भारी भरकम फीस है. सरकारी मेडिकल कॉलेज और सामान्य प्राइवेट कॉलेज की तुलना में डीम्ड यूनिवर्सिटी पर फीस कैपिंग लागू नहीं होती है, जिससे उनकी फीस काफी ज्यादा होती है. यूनिवर्सिटीज में सालाना ट्यूशन फीस 21 लाख से 35 लाख रुपये तक होती है. वहीं अगर हॉस्टल, मैस और दूसरे खर्चों को जोड़ दिया तक जाए तो छात्र का सालाना खर्च 21 लाख से 30 लाख या उससे भी ज्यादा पहुंच जाता है. ऐसे में पूरे साढ़े साल के एमबीबीएस कोर्स के दौरान ट्यूशन फीस और हॉस्टल फीस मिलाकर कुल खर्च 94.5 लाख से 1.57 करोड़ तक पहुंच जाता है. इसके विपरीत देश के दूसरे राज्यों के प्राइवेट कॉलेज में औसतन फीस 17 लाख रुपये तक होती है.
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छात्रों के लिए आर्थिक तंगी बनी रुकावट
डीम्ड यूनिवर्सिटीज की फीस और खाली सीटों के चलते नीट पर सवाल खड़े हो गए हैं. इसे लेकर कई एजुकेशन एक्सपर्ट्स का कहना है कि ज्यादा अंक पाने वाले मेधावी छात्र आर्थिक तंगी के कारण इन महंगी डीम्ड यूनिवर्सिटीज के लिए काउंसलिंग में ऑप्शन ही नहीं चुनते हैं. इसके उलट कम अंक पाने वाले लेकिन आर्थिक रूप से समक्ष छात्र इन सीटों पर कब्जा कर लेते हैं या फिर यह सीटें खाली रह जाती है. इससे राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली मेरिट आधारित परीक्षा का मूल उद्देश्य भी प्रभावित होता है.
क्या अब होगी स्पेशल काउंसलिंग?
काउंसलिंग के अंतिम राउंड का रिजल्ट घोषित होने के बाद अब बचे हुए उम्मीदवारों की नजरें इस बात पर टिकी है कि क्या खाली सीटों को भरने के लिए कोई स्पेशल काउंसलिंग राउंड आयोजित किया जाएगा. रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार और एमसीसी की मंजूरी मिलने की स्थिति में ही स्पेशल काउंसलिंग राउंड हो सकता है.
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