
अमेरिकी राजनीति में समोसा कॉकस को और मजबूत करने वाले सुहास सुब्रह्मण्यम केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि वह एक वकील, टेक एंटरप्रेन्योर और वालंटियर फायर फाइटर भी रह चुके हैं.

सुहास सुब्रह्मण्यम के माता-पिता 1970 के दशक में भारत से अमेरिका जाकर बस गए थे. सुहास का जन्म टेक्सास के ह्यूस्टन शहर में हुआ था. उनकी परवरिश भारतीय संस्कृति से जुड़ी रहकर हुई. सुहास सुब्रह्मण्यम अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता की मेहनत और शिक्षा को देते हैं. वर्तमान में वे अपनी पत्नी मिरांडा सुब्रमण्यम और दो बेटियों के साथ वर्जीनिया के लाउडौन काउंटी में रहते हैं.

एजुकेशन की बात करें तो सुहास सुब्रह्मण्यम ने ट्यूलेन यूनिवर्सिटी से अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी की. कॉलेज के दौरान ही उन्होंने समाज सेवा शुरू की और हरिकेन कैटरीना से प्रभावित समुदायों के पुनर्निर्माण के लिए स्वयंसेवकों को संगठित करने में बड़ी भूमिका निभाई थी. इसके बाद उन्होंने प्रतिष्ठित नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी से ऑनर्स के साथ लॉ की डिग्री पूरी की.

लॉ की पढ़ाई के दौरान सुहास ने सेंटर ऑन रॉन्ग फुल कन्विक्शन के साथ काम किया. इस दौरान उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति का केस लड़ा, जिसे गलत तरीके से उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी. सुहास सुब्रह्मण्यम के ठोस कानूनी के तर्कों और सबूतों के दम पर उस निर्दोष व्यक्ति को जेल से बरी कराया जा सका.

वहीं लॉ की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने कैपिटल हिल में एक नीति सलाहकार के रूप में काम किया. यहां उन्होंने लाखों अमेरिकियों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच आसान बनाने, इमीग्रेशन सुधारों के लिए सर्वदलीय समर्थन जुटाना और पूर्व सैनिकों, बुजुर्गों और कामकाजी परिवारों के लिए रोजगार और फंड बढ़ाने से जुड़े कानूनों के मसौदे तैयार किए.

2015 में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सुहास सुब्रह्मण्यम को व्हाइट हाउस में टेक्नोलॉजी पॉलिसी एडवाइजर नियुक्त किया. यहां उन्होंने एआई, साइबर सुरक्षा और आईटी क्षेत्र में रोजगार से जुड़ी राष्ट्रीय नीतियों का नेतृत्व किया.

व्हाइट हाउस के कार्यकाल के बाद उन्होंने लाउडौन काउंटी में अपनी आईटी और कंसल्टिंग कंपनी शुरू की. इसके साथ ही वे लाउडौन लॉकडाउन मेडिकल रिजर्व कॉर्प के तहत एक एक्टिव वालंटियर इमरजेंसी मेडिकल टेक्नीशियन और फायर फाइटर के रूप में काम करते रहे. जहां वे आपात स्थितियों में आग बुझाने और लोगों की जान बचाने के लिए मैदान में उतरते थे.

वहीं 2019 में राजनीति में कदम रखते ही उन्होंने वर्जीनिया हाउस ऑफ डेलिगेट्स का चुनाव जीता. इसके साथ ही वह वर्जीनिया जनरल असेंबली के इतिहास में चुने जाने वाले पहले दक्षिण एशियाई, पहले हिंदू और पहले भारतीय अमेरिकी प्रतिनिधि बने.
Published at : 05 Nov 2026 06:31 PM (IST)
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