चंद्रशेखरन की ताजपोशी को Tata Trust ने बताया गैर-कानूनी, खारिज किया बोर्ड का फैसला

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टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा संस बोर्ड की ओर से एन चंद्रशेखरन को दोबारा चेयरमैन नियुक्त किए जाने को गैर कानूनी बताया है और बोर्ड के फैसले को खारिज कर दिया है. टाटा ट्रस्ट्स का साफ कहना है कि बोर्ड की बैठक में पड़े 4:1 के वोट का कोई कानूनी मतलब नहीं है, क्योंकि कंपनी के नियमों के तहत चेयरमैन की नियुक्ति के लिए ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टर्स की सहमति अनिवार्य शर्त है, जो कि पूरी नहीं हुई.

टाटा संस के बोर्ड ने एन चंद्रशेखरन को अगले 5 साल के लिए दोबारा चैयरमेन के पद पर नियुक्त करने का प्रस्ताव पास किया था, लेकिन कंपनी के सबसे बड़े शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले को कानूनी रूप से शून्य करार दिया है. टाटा ट्रस्ट्स ने रविवार को जारी एक बयान में कहा कि कंपनी के नियमों के मुताबिक टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों का सकारात्मक समर्थन किसी भी निर्णय लेने के लिए बोर्ड को नहीं दिया गया था. 

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‘कास्टिंग वोट’ के इस्तेमाल का तर्क भी खारिज

ट्रस्ट्स ने बोर्ड की ओर से ‘कास्टिंग वोट’ के इस्तेमाल के तर्क को भी खारिज करते हुए कहा कि जब नियम साफ हैं तो इसे गतिरोध नहीं कहा जा सकता. टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि अध्यक्ष का निर्णायक मत केवल तभी लागू होता है, जब पूरे बोर्ड में मतों की बराबरी हो. यह टाटा ट्रस्ट्स के मनोनीत निदेशकों पर लागू नहीं होता. चाहे मतदान का रिजल्ट 4:1 रहा हो या कोई और आंकड़ा, यह मान्य योग्य नहीं है.

टाटा ट्रस्ट्स ने प्रेस रिलीज जारी कर बताया है कि टाटा संस के बोर्ड में टाटा ट्रस्ट्स के दो नामित सदस्य हैं. दो में से बहुमत दो होता है, एक नहीं. एक निदेशक ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया था और इसलिए एसोसिएशन के नियमों के मुताबिक टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों का सकारात्मक समर्थन नहीं दिया गया. ट्रस्ट्स ने कहा कि ऐसे में शर्त पूरी नहीं हुई और इसलिए प्रस्ताव भी विफल हो गया.

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टाटा ट्रस्ट्स ने दिया साइरस मिस्त्री विवाद का हवाला

टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि टाटा संस के नियमों के तहत ट्रस्ट के नामित डायरेक्टर्स को मिले Affirmative Voting Rights पूरी तरह वैध हैं, क्योंकि खुद टाटा संस ने पहले सुप्रीम कोर्ट में साइरस मिस्त्री विवाद के दौरान इन्हीं नियमों का जोरदार बचाव किया था. उस समय सुप्रीम कोर्ट ने भी टाटा संस की दलील मानते हुए इन नियमों को सही ठहराया था.

ऐसे में ट्रस्ट्स का तर्क है कि जिस सुरक्षा और अधिकार को खुद टाटा संस ने देश की सबसे बड़ी अदालत में सही साबित कराया था, आज वह अपनी सुविधानुसार उसी नियम से पीछे नहीं हट सकती और न ही उसे नजरअंदाज कर सकती है.

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