UP की आबकारी नीति: जानिए कैसे तय होते हैं शराब और बीयर के दाम

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उत्तर प्रदेश सरकार के आबकारी विभाग ने फेस्टिव सीजन को देखते हुए हाल ही में फैला किया है कि अब शराब की दुकानें एक घंटा और ज्यादा खुलेंगी. इसका मतलब है कि शराब की दुकानें जो अब तक 10 बजे बंद हो जाया करती थीं अब वो 11 बजे रात को बंद हुआ करेंगी. इसी बीच उत्तर प्रदेश सरकार की आबकारी नीति को लेकर भी चर्चा हो रही है.

क्या आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में शराब और बीयर के दाम कैसे तय किए जाते हैं? इसमें और क्या- क्या इंक्लूड किया जाता है? अगर नहीं जानते, तो आइये आज आपको इसी बारे में बताते हैं.

कैसे तय होते हैं शराब और बीयर के दाम?
उत्तर प्रदेश में शराब या बीयर की बोतल का दाम सिर्फ कंपनी या दुकानदार अपनी मर्जी से तय नहीं करता. इसकी कीमत तय करने में राज्य की आबकारी नीति की बड़ी भूमिका होती है. सरकार हर वित्त वर्ष के लिए आबकारी नीति जारी करती है, जिसमें शराब की अलग-अलग श्रेणियों पर शुल्क, लाइसेंस फीस, दुकानदार और थोक विक्रेता का मार्जिन और अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP तय करने के नियम होते हैं.

कीमत के साथ जुड़ते हैं अन्य शुल्क
शराब की कीमत तय करने में एक्साइज ड्यूटी और कंसिडरेशन फीस जैसे सरकारी शुल्क महत्वपूर्ण होते हैं. देशी शराब, IMFL, बीयर और वाइन जैसी अलग-अलग श्रेणियों के लिए शुल्क और नियम अलग हो सकते हैं. इतना ही नहीं शराब की दुकान चलाने के लिए लाइसेंस फीस भी देनी होती है. IMFL, बीयर और अन्य श्रेणियों की दुकानों के लिए लाइसेंस से जुड़े शुल्क आबकारी नीति के तहत तय किए जाते हैं. इन खर्चों का असर भी शराब की कीमत पर पड़ता है.

अल्कोहल की मात्रा भी है जरूरी
शराब की कीमत तय करने में उसकी अल्कोहल बाय वॉल्यूम (ABV) यानी उसमें मौजूद अल्कोहल की मात्रा भी महत्वपूर्ण होती है. अलग-अलग अल्कोहल स्ट्रेंथ वाली शराब के लिए शुल्क और कीमत तय करने का तरीका अलग हो सकता है. इसके अलावा बोतल या पैक का साइज भी कीमत को प्रभावित करता है. शराब और बीयर अलग-अलग पैक साइज में बिकती हैं, इसलिए हर बोतल या कैन की कीमत एक जैसी नहीं होती. आबकारी नीति में अलग-अलग पैक साइज के हिसाब से शुल्क और MRP तय करने के नियम दिए जाते हैं.

मार्जिन भी जुड़ता है
शराब की MRP में केवल सरकारी टैक्स और फीस ही शामिल नहीं होते. इसमें थोक विक्रेता और रिटेल दुकानदार का मार्जिन भी शामिल होता है. उदाहरण से समझें तो, यूपी की 2026-27 की आबकारी नीति में IMFL के लिए EDP यानी एक्स डिस्टिलरी प्राइस, कंसिडरेशन फीस, थोक विक्रेता का मार्जिन और रिटेलर का मार्जिन अलग-अलग तय किए गए हैं. इन सभी को निर्धारित नियमों के अनुसार जोड़कर आखिरी MRP तय की जाती है.

हर दुकान की लागत होती है अलग
शराब की दुकान चलाने की लागत हर जगह एक जैसी नहीं होती. ये कई बातों पर निर्भर करती है, जैसे दुकान किस जिले या इलाके में है, वहां शराब की बिक्री कितनी होती है, दुकान किस कैटेगरी की है और उसका लाइसेंस नया है या पहले से चल रहा है.

कैसे तय होती है MRP?
शराब की कीमत तय करने में कई सारी स्टेज होती हैं, जैसे:

  • सबसे पहले कंपनी की कीमत देखी जाती है.
  • इसके बाद सरकारी शुल्क जोड़ा जाता है.
  • इसके बाद थोक विक्रेता का मार्जिन जोड़ा जाता है.
  • इसके बाद रिटेलर का मार्जिन जोड़ा जाता है.
  • इसके बाद आखिर में अन्य निर्धारित शुल्क जोड़ जाते हैं, इन सभी को मिलाकर अंतिम MRP तय की जाती है.

बता दें कि बीयर के लिए भी इसी तरह EBP यानी Ex-Brewery Price, कंसिडरेशन फीस और थोक-रिटेल मार्जिन को ध्यान में रखकर MRP तय की जाती है.

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