ब्रिटेन में डीजल संकट, डोनाल्ड ट्रंप की एक धमकी से मची यूरोप में खलबली

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ब्रिटेन में डीजल की कीमत पहली बार 2 यूरो (करीब 216 रुपये) प्रति लीटर के पार पहुंच गई है. डीजल की औसत कीमत बढ़कर 200.01 पेंस प्रति लीटर हो गई है. ईंधन की कीमतों में इतनी तेजी से बढ़त चिंता का विषय है, क्योंकि इसे देखते हुए लगता है कि सर्दियों में स्थिति और खराब हो सकती है. हो सकता है कि डीजल का संकट भी लोगों को देखने को मिल सके.

दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प यूरोप के देशों पर दबाव बना रहे हैं कि वे अपने डीजल के भंडार से ईंधन बाजार में उतारें, ताकि बढ़ती कीमतों को काबू किया जा सके. ट्रम्प ने ये भी चेतावनी दी है कि अगर सहयोगी देश ऐसा नहीं करते हैं तो अमेरिका डीजल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा सकता है.

कार में डीजल भरवाना हुआ महंगा
RAC के मुताबिक, एक सामान्य परिवार की कार में पूरा डीजल भरवाने का खर्च अब करीब 110 यूरो (11.9 हजार रुपये) हो गया है. ये अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू होने के समय के मुकाबले करीब 32 यूरो (3467 रुपये) ज्यादा है.

वहीं RAC के पॉलिसी प्रमुख साइमन विलियम्स ने कहा कि डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी आम लोगों के साथ-साथ ट्रांसपोर्ट, डिलीवरी और ज्यादा वाहन चलाने वाली कंपनियों के लिए बड़ी परेशानी बन रही है. कुछ विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर अमेरिका डीजल निर्यात पर रोक लगाता है तो ब्रिटेन में डीजल की कीमत 3 यूरो प्रति लीटर तक पहुंच सकती है.

अमेरिका चाहता है यूरोप अपने डीजल भंडार खोले
अमेरिका ने यूरोपीय देशों से अपने डीजल भंडार का इस्तेमाल करने को कहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका चाहता है कि यूरोपीय संघ अगले छह महीनों में करीब 12 करोड़ बैरल डीजल बाजार में जारी करे. अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने कहा है कि यूरोप की ओर से जल्द ही अतिरिक्त डीजल सप्लाई की घोषणा की उम्मीद है. वहीं, अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने यूरोपीय देशों से डीजल भंडार तुरंत जारी करने को कहा है.

ब्रिटेन के पास 40 दिन का भंडार
बता दें कि ब्रिटेन के पास करीब 40 दिनों की जरूरत के बराबर डीजल का भंडार है. वहीं, कुछ अन्य यूरोपीय देशों के पास 200 दिनों से ज्यादा का स्टॉक मौजूद है. ब्रिटेन की करीब एक-चौथाई डीजल सप्लाई अमेरिका से आती है. इसलिए अगर अमेरिका ने डीजल निर्यात पर रोक लगाई तो ब्रिटेन पर इसका असर पड़ सकता है. यूरोप पहले ही रूस से तेल और ईंधन आयात पर प्रतिबंध लगाने के बाद अमेरिकी ईंधन पर ज्यादा निर्भर हो गया है.

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